आचार्य तुलसी : ज्योतिर्मय साधक
By आचार्य महाप्रज्ञ
Summary
आचार्य तुलसी का जीवन मुनित्व, गुरुत्व और धर्म के नेतृत्व की एक उल्लेखनीय निष्पत्ति है। मुनि बनना जीवन की बड़ी घटना है, जिसमें व्यक्ति शरीर, इच्छा, संकल्प और अहं का विसर्जन करता है। तुलसी ने एक दिन मुनि बनकर महामना कालूको अपना गुरु चुना और अहं से इतने खाली हुए कि गुरु ने उन्हें भर दिया। बाईस वर्ष की छोटी अवस्था में ही वे गुरु बन गए। तेरापंथ परंपरा में गुरु ही किसी को गुरु बनाता है, किंतु गुरुत्व प्रदत्त नहीं हो सकता। आचार्य तुलसी ने अपने गुरुत्व को इतना विकसित किया कि यह अनुभव नहीं हुआ कि वह गुरु प्रदत्त है। उन्होंने विद्या का वितरण शिष्यों, गुरु-भाइयों और समूचे वातावरण में किया, जिससे तेरापंथ का मनीषी वर्ग ज्ञान के शिखरों को छूने लगा। नैतिकता और धर्म-ज्ञान तभी कृतार्थ होता है जब उसकी निष्पत्ति आचार में होती है। ग्यारह वर्ष तक ज्ञान की अजस्र
Conclusion
आचार्य तुलसी के जीवन और साधना का यह विवरण बताता है कि सच्चा गुरुत्व केवल पद से नहीं, बल्कि आचरण और नैतिकता के विकास से प्राप्त होता है। उन्होंने धर्म को क्रियाकाण्ड से मुक्त कर नैतिकता को उसका मूल आधार बनाया। इसका सबसे बड़ा परिणाम यह हुआ कि धर्म की प्रतिष्ठा अब नैतिकता-शून्य नहीं रही। उनके नेतृत्व ने यह अनुभूति कराई कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति और समाज का कल्याण