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प्राकृत की कुछ दुर्लभ पाण्डुलिपियाँ

By Phoolchand Jain Premi

Vol. 392015pp. 43-49Hindi

Summary

भोजलीलाल लोढ़ेरचन्द भारतीय विद्या संस्थान के हस्तलिखित संग्रहालय की यह अध्ययनात्मक लेख पाण्डुलिपियों की विरलता और महत्व को रेखांकित करता है। लेखक बताता है कि संस्थान ने पिछले कई दशकों में प्राकृत, अपभ्रंश और हिन्दी साहित्य से सम्बद्ध अनेक हस्तलिखित पाण्डुलिपियों का संग्रह किया है, जिनमें ताड़पत्र और भोजपत्र पर लिखे अति प्राचीन ग्रंथ भी सम्मिलित हैं। लेख में पाण्डुलिपियों के रख-रखाव, सूचीकरण और संरक्षण की चुनौतियों का उल्लेख है, तथा यह बताया गया है कि अनेक ग्रंथ अभी तक विद्वानों के अध्ययन से अछूते हैं। संस्थान ने शोधार्थियों के लिए पढ़ने कक्ष एवं प्रतिलिपि सुविधा उपलब्ध करायी है, साथ ही प्राकृत साहित्य पर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियाँ आयोजित की जाती हैं। लेख में कुछ विशिष्ट पाण्डुलिपियों का परिचय दिया गया है – उदाहरण के लिए, तेरहवीं शताब्दी का ‘उत्तराध्ययन सूत्र’ तथा दुर्लभ प्राकृत काव्यों के संग्रह। लेखक इन्हें उद्धृत करके लेखनशैली, भाषा और चित्रांकन के सौंदर्य की व्याख्या करता है। इन पाण्डुलिपियों में कई जगह अलग-अलग लिपियों और हस्ताक्षरों का मिश्रण है, जिससे पता चलता है कि ग्रंथों का संकलन विभिन्न कालों में हुआ। पाण्डुलिपि निर्माताओं द्वारा रखे गए तांबे या चांदी के आवरण, लाल स्याही से लिखे शीर्षक तथा चित्रित प्रारंभिक पृष्ठों की खासियतों पर भी चर्चा है। लेखक बताता है कि दुर्लभता के बावजूद ये पाण्डुलिपियाँ अत्यन्त समृद्ध हैं और इनके अध्ययन से हमें प्राचीन जैन कथा-साहित्य, व्याकरण और दर्शन की महत्त्वपूर्ण जानकारी मिलती है। संस्थान द्वारा इन्हें नई पीढ़ी तक पहुँचाने के प्रयास, जैसे फोटोग्राफिक प्रतियां बनाना, प्रकाशित ग्रंथों के रूप में संपादन एवं प्राकृत अध्ययन-प्रशिक्षण कार्यक्रम भी वर्णित हैं। लेख का उद्देश्य शोधकर्ताओं को इस अमूल्य धरोहर की ओर आकर्षित करना है ताकि आगे अनुसंधान हो सके और संरक्षित ग्रंथों से भारतीय ज्ञान-परंपरा का पुनरुद्धार हो।

Conclusion

लेख का निष्कर्ष यह है कि प्राकृत पाण्डुलिपियाँ केवल संग्रहणीय वस्तु नहीं हैं बल्कि हमारी सांस्कृतिक स्मृति का जीवंत स्रोत हैं। इन्हें संरक्षित रखने और विद्वानों को उपलब्ध कराने से प्राकृत साहित्य के अनेक अज्ञात पक्ष उजागर हो सकते हैं। लेखक संस्थान के प्रयासों की सराहना करते हुए सुझाव देता है कि अधिक से अधिक शोधार्थी इन पांडुलिपियों का अध्ययन करें और आधुनिक तकनीकों से उनका डिजिटलीकरण कर आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित करें।

Article order

In this issue

Vol. 39
1-13Vijñānamātra and Vijñaptimātra: A ReappraisalYan Cao1-16Aesthetic Experience of Visual ArtsG. C. Tripathi14-28The Text‑Study in Folk‑Epics of Western IndiaHasu Yajnik17-19Rajyavardhana : A ProfileSatyavrat Verma20-23Traces of Modern Military Sciences in Prakrit EpicsPulak Goyal24-29Two Less Known Works of BilhanaM. A. Dhaky29-40Traces of Nirgrantha’s Thought in Buddhist TextsJitendra B. Shah30-33The Vedanta Philosophy Anticipating Science of the Modern WorldVijay Pandya34-42The Edificial Pattern of the Marwari’s Dwelling and their Frescoes with special reference to Modi Haveli, JhunjhunuTanuja Singh41-53Pacchakkhāṇa Leading to SallekhanāHampa Nagarajaiah43-49प्राकृत की कुछ दुर्लभ पाण्डुलिपियाँPhoolchand Jain PremiCurrent article50-69शार्दूल पाण्डुलिपियों में श्लोकों की वृद्धि‑ह्रास का विश्लेषणVasantkumar M. Bhatt54-61Excerpts Quoted in the Nāṭyadarpaṇa from the Devīcandragupta: A Critique on Their SignificanceSatyavrat Verma62-70A Grammatical Analysis of the Dvyāśraya‑Mahākāvya’s Śaurasenī ŚlokasMana Apoorva Shah70-75वेद का अवांचीन अध्ययनVijay Pandya71-89प्राकृत काव्य की चारिता के भाविक आधारBalram Shukla76-83जैनधर्म में आध्यात्मिक विकास एवं बौद्ध परम्पराVijaykumar Jain84-98जैन साहित्य में लेश्या‑विमर्शRaka Jain90-97हेमचन्द्राचार्य के प्राकृत व्याकरण में अभिज्ञानशाकुन्तलम्Vasantkumar M. Bhatt98-112अथ स्वतः परतः प्रमाणं परीक्ष्यतेAmbikadatt Sharma99-102पाँच समितियों का व्यापक अर्थ : श्रावकों की अपेक्षा सेVeersagar Jain103-108अपरिग्रह एवं प्रजातांत्रिक अर्थव्यवस्थाN. K. Khicha109-121देवेंद्रसूरिजीकृत सुबधकथा प्राकृत पाण्डुलिपि में आचार शास्त्रीय विवेचनHemvati Nandan Sharma113-119रत्नपालचरितम् : एक विवेचनHemvati Nandan Sharma120-124महोपाध्याय क्षमाकल्याण जी रचित साहित्यManiguru Charanraj Arya Mehulprabhasagar122-131आदिकाव्य का जीवन‑दर्शनBalram Shukla125-128वेदों में वर्णित राष्ट्रीय भावनाMahendrakumar A. Dave129-131અનુયોગદ્વાર સૂત્રના રચનાકાળ વિશે કાંઈક (Anuyogasar Sutra na Rachnakal vishe Kaik)Sadhvishri Mrigavatishriji M.132-137ન્યાય દર્શન – એક પરિચય (Nyaya Darshan – Ek Parichay)Laxman V. Joshi132-141“उत्तराध्ययन‑सूत्र” की पाण्डुलिपियों में चित्रित रूपाकृतियाँRajendra Prasad138-151મધ્યકાલીન સાહિત્યનો અમૂલ્ય ખજાનો (Madhyakalin Sahityano Amulya Khajano)Abhay Doshi142-148जैन साहित्य का राजस्थानी चित्रकला पर प्रभावRunjhun Rajawat, Tanuja Singh149-155बसोहली शैली में गीतगोविन्द अंकनRitika Garg152-160આચાર્ય જયવંતસૂરિકૃત શૃંગારમંજરી : એક અનન્ય સંપાદન (Acharya Javantsuri Kruta Shungaramanjari : Ek Anany Sampadan)Abhay Doshi161-174હસ્તપ્રતો : ભારતીય ઈતિહાસ અને સંસ્કૃતિનો અમૂલ્ય સ્રોત (Hastraprat: Bharatiya Itihaas ane Sanskriti no Amulya Srot)Bharti Shelat

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