आगम के आलोक में आचार्य भिक्षु
Summary
18वीं सदी के संत आचार्य भिक्षु एक महान तत्ववेत्ता थे, जिन्होंने बिना विश्वविद्यालयी शिक्षा के गहन तत्वज्ञान अर्जित किया। मुनि जीवन स्वीकारने के बाद आगमों के अध्ययन में लगे, उन्होंने पाया कि उनके आचार-विचार और आगमों के तत्व निरूपण में एकरूपता नहीं है। स्थानकवासी संप्रदाय के आचार्य रघुनाथ जी से जिज्ञासाओं का समाधान न मिलने पर वे उस परंपरा से अलग हो गए और स्वतंत्र साधना करने लगे, जो तेरापंथ के नाम से प्रख्यात हुई। आचार्य भिक्षु ने आगम के आलोक में अनेक प्रस्थापनाएं कीं, जिनमें शुद्ध साधन से ही शुद्ध साध्य की प्राप्ति, धर्म और अधर्म का अमिश्रण, हर स्थिति में हिंसा को हिंसा मानना, पुण्यबंध का धार्मिक क्रिया से जुड़ा होना, धर्म का आधार संप्रदाय नहीं बल्कि जीवन की पवित्रता, और संयममय जीवन को सम्यक् एवं सार्थक मानना शामिल है। तत्कालीन धर्मगुरु इन प्रस्थापनाओं से
Conclusion
आचार्य भिक्षु की प्रस्थापनाओं का सबसे महत्वपूर्ण परिणाम यह है कि उन्होंने धार्मिक आचरण में शिथिलता के विरुद्ध एक कठोर और स्पष्ट मार्ग प्रशस्त किया। उनके द्वारा स्थापित तेरापंथ संप्रदाय ने साधना में शुद्ध साधनों पर बल देकर यह सिद्ध किया कि आगमों के मूल तत्त्वों से समझौता किए बिना भी एक अनुशासित और आचारनिष्ठ संघ का निर्माण संभव है। उनके विचारों का प्रभाव केवल उनके समकालीनों तक स