શાબરભાષ્યગત ભાષાવિચાર
By Narayan M. Kansara
Summary
શાબરભાષ્યગત ભાષાવિચાર लेखમાં લેખક प्रાચીન મીમાંસા શાસ્ત્રના પ્રખ્યાત ટીકાગ्रંથ "શાબરભાષ્ય" नी भाषा-कृति ને सुક્ષ્મતાથી परखे છે। તેઓ प्रાચीन विद्वान शबर स्वामी नी व्याख्याओं માં वापरायला सांस्थिक शब्दો, प्रयोगો औने विधान ने विस्तृत उदाहरणों साथे समझावे છે। આમાં शब्द औने अर्थ न संबंध, अर्थ निर्धार माटे संज्ञा, नियम औने निगम न नियमों औने श्रुति- स्मृति मा आवेला अनेक प्रमाणों न समन्वय केवी रिते थाय छे ते दर्शावामा आवे छे। लेख़क पाणिनि न अष्टाध्यायी सूत्रों औने शबरस्वामी न निष्णात टिप्पणियों बीच संवाद करावे छे, जे मा क्रिया, संज्ञा, समास, तद्धित, निपात, प्रश्लिष्ट औने प्रत्ययो न स-पूर्व तारण आपवा मा आवे छे। ग्रंथ मा उच्चार औने लिप्यङ बीच न अंतर, धार्मिक ध्वनि औने साम्प्रदायिक अर्थ नी जुदी जुदी संभावनाओं नु पन सूचन छे। लेख़ शाबरभाष्य मा आवेला प्रसंगों न सहज भाषांतर करे छे औने लेख़क हरिफाइ न पंडितत्व टाळी गुणवत्तापूर्ण भाषा-विज्ञानिक प्रणेताने ओळखावा प्रयत्न करे छे। आ बद्धी चर्चा मा तेओ ए पन उल्लेखे छे के शाबरभाष्य नी शैली मात्र एक टिका ग्रंथ नथी, पण ते भाषा-विज्ञान औने दर्शन न सजीव दस्तावेज छे। लेख़ मा स्वर औने व्यंजनो नी रचना, उच्चारण नी विशेषता औने कव्यों, स्त्रोतों, सूत्रों औने अनुवाद न उदाहरणो पन प्रस्तुत करे छे। तटस्थ अभिगम थी लेख़क दर्शावे छे के शाबरभाष्य मा व्याकरण, अनुप्रास, उपमानो औने शैलीय devices केवी रिते वणावेला छे। तेओ अव्ययो औने नामधातुओ न विभाजन, विशेषण औने क्रियानां काइदा, तथा अन्य अनुसंस्कृतियों साथे नी संवादिता पन जुए छे। परिणामे, आ लेख़ शाबरभाष्य नी भाषा नी गहन विश्वसनीयता, ते नी अभिनवता औने ते न आधुनिक मूल्य प्रकट करे छे, साथे साथे वाचकने ज्ञान न व्यापक दृष्टिकोण आपे छे।
Conclusion
આ लेख નिष્કर्ष आपे छे के शाबरभाष्य नी भाषा मात्र व्यवहारिक व्याकरण के दार्शनिक वाद नथी, पण शब्द औने अर्थ न संबंध नी सूक्ष्म समझण छे। प्राचीन भाषा-विचार आत्म-अनुभव, परंपरा औने तर्क न मिलाप छे। आ अध्ययन थी भाषा न मूलभूत सिद्धांतों ने समझी शकाय छे औने आजे पन अप्रित्यक्ष थती भाषा औने संस्कृति वचे नो संवाद सजीव रखी शकाय छे।