જૈન સુરિશન્ય વિતરાગસ્તુતિ
By Madhusudan Dhanki
Summary
"જૈન સુરિશન્ય વિતરાગસ્તુતિ" મા Madhusudan Thandi जैन धर्म न आदरणीय વિતરागી गुरुओ नी स्तुति प्रधान रचनाओ नु विस्तृत विश्लेषण करे छे। लेखक पुराने ग्रंथो औने स्तुति गीतो न आधारे વિતરाग न नियम न उदार आदर्श ने प्रस्तुत करे छे। लेख़ शील, अहिंसा औने त्याग न सिद्धांतो, तथा आत्म न सार अर्पण करणारी आराधना नु भावुक वर्णन छे. ते मा metres, શબ્દचित्र, अनुप्रास औने कल नैपुण्य नी चर्चा छे; साथे साथे श्री शाहीप्रभुसूरी औने बीजा सुरियो न जीवन न किस्साओ न उल्लेख छे. लेख़ भक्ति गीतो न संग्रह मात्र नथी, परन्तु शिल्पशैली औने जैन धार्मिक दृष्टि न संगम छे. लेख़ मा પાટણ, ગિરનાર औने શ્રવણબેલગોલा जेवा मंदिर क्षेत्रो न वर्णन औने कथा छे जे मा વિતરાગी गुरुओ न जीवन थी प्रेरणा मले छे. लेखक न हेतુ छे के समकालीन युवाओ माटे आ गुरુस्तोतियो केवी रिते अनुकरणीय छे. प्राचीन औने नव शब्दसमूह मा तेओ अधिक अर्थबद्धता बाहर लावे छे औने યतिक्रम, उच्चारण शैली औने नादवैभव पन अन्वेषे छे. आ अध्ययन विगतराग स्तुति नी मर्मवेदना उजागर करे छे औने आगेही आपे छे के भक्ति औने शास्त्र विचार आपस मा वड़ी विशाल अगियार.
Conclusion
લેખનું અંતે એમ કહે છે કે Jain વિતરाग સ્તુતિयो માત્ર धार्मिक मन्त्रो નथी; ते भावना औने आदर नी કाव્યात्मक अभिव्यक्ति छે। मधुसूदन ઠांडी दर्शावे छे કે केवी रिते प्राचीन स्तुति आजे पन आत्म शांत औने आध्यात्मिक प्रेरणा आपी सके छે. आ तरहे ધરોહर नु संरक्षण માત્ર स्मृति नथी, परन्तु सक्रिय आध્યાત્મिक पसंदगी बनी रहे छે।