પાણિનિય વ્યાકરણમાં લાઘવસિદ્ધિ
By Vasantkumar M. Bhatt
Summary
પાણિનિય વ્યાકરણમાં લાઘવસિદ્ધિ लेख़ प्राचीन भारतीय व्याकरणशास्त्र न महाज्ञ पाणिनि नी अष्टाध्यायी पासे नी बौद्धिक पूर्णता ने अर्थ विधि थी समझावे छे। પાણिनि ए संक्षिप्त सूत्रो द्वारा खुब व्यापक व्याकरण ने गमे ते वाક્યો माटे उपयोगी बनाव्यु छे। लेख़क शास्त्र न 'લાઘવ' —ब्रेविटी— विषय पर भार मुके छे औने बताए छे के पાણिनि केवी रिते अनुपबंधो, प्रत्याहार, सांज्ञा औने परिभाषा जेवा साधनो वडे भाषा न बद्धा नियमों ने थोड़ा शब्दों मा समावी ले छे। लेख़ मा उदाहरणो साथे जुई शकाय छे के 'इको यन अचि' जेवा एक ज सूत्र मा अनेक सामान्य नियमों शामेल छे। लेख़ક आधुनिक जनरेटिव व्याकरण औने वर्णात्मक व्याकरण साथे પાણિનि नी पद्धति नी तुलना करे छે, तथा ए सुझवे छे के आजे लागूता अमुक छंदपूर्ण नियमों नो मूल आधार પાણिनि पासे छे। लेख़ मा तेओ सुझवे छे के લાઘव मात्र अल्प शब्द संख्या माटे नथी परन्तु ए व्याकरण नी सवाँउ नी गहिरी समझण औने योग्य क्रमबद्धता नो दृष्टांत छे। પાણिनि मार्ग दर्शीत रिते समझावे छे के जो नियमों नु गોઠवणी सौમ्य औने सचोट होए तो विदेय ओछा पण काम वधारे करी शके छे। लेख़ मा सूत्रपाठ, धातुपाठ, गणपाठ तथा उपसर्ग औने नीपात नी गોઠवणी केवी रिते economy-of-expression न प्रमाणपत्र आपे छे ते पन विश्लेषण करे छે। संकलन तहत લાઘव न आदर्श मात्र भाषा-शास्त्री ओ माटे प्रयोजन नथी; ए शैक्षणिक रिते पन शिष्यने सहेलाई थी व्याकरण उखे छे। अंत मा, लेख़ मा याद रखवा जेवी कल्पनाओं औने मूल्यांकन प्रदान करवा मा आवे छે।
Conclusion
લેખક અંતે કહે છે કે પાણિનિ नी व्यાકरण પદ્ધति मा લાઘવ માત્ર ચમત्कार નथी; ए एकીભूत ચेतना न दर्शन ने प्रकट करे छे। अષ્ટाध्यायी नी संरचना मा समाइल economy-of-expression ने समझवा मानिस ने classical व्याकरण प्रति नवी कदर औने जुदो दृष्टिकोण मले छे। आ लेख़ वाचक ने ए समझावे छे के પાણિનि नो લાઘવ भव्यता, गति शीलता औने व्यवस्थित योजन नो प्रतीक छे।