पाइअ-सद्द-महण्णवो में अनुपलब्ध वसुदेवहिण्डी की शब्दावली
By K. R. Chandra
Summary
यह लेख प्राकृत कोश ‘पाइअ‑सद्द‑महण्णवो’ और जैन कथा‑ग्रन्थ ‘वसुदेवहिण्डी’ की शब्दावली की तुलना करता है। लेखक उन शब्दों की सूची प्रस्तुत करते हैं जो वसुदेवहिण्डी में तो मिलते हैं परन्तु प्रसिद्ध कोश में अनुपलब्ध हैं। ऐसे शब्दों में स्थानीय बोलियों के रूप, संयुक्त रूप, तकनीकी धार्मिक शब्द और दैनिक जीवन से सम्बन्धित शब्द शामिल हैं। प्रत्येक शब्द के लिए उसका संदर्भ, सम्भावित अर्थ, धातु‑स्रोत और अन्य प्राकृत ग्रन्थों में उपयोग का उल्लेख किया गया है। लेखक दर्शाते हैं कि प्राकृत साहित्य की विविधता इतनी व्यापक है कि एकमात्र कोश सभी शब्दों को नहीं समेट सकता। यह अध्ययन प्राकृत भाषा के क्षेत्रीय रूपों, द्रविड़ loanwords और शब्दार्थ परिवर्तन को उजागर करता है और संस्कृता तथा बोलचाल के मिश्रण को समझने में सहायता करता है। शोध से यह भी पता चलता है कि शब्द‑संग्रह की कमी के कारण सम्पादकों को ग्रन्थों की व्याख्या में कठिनाई होती है और व्यापक, अद्यतन प्राकृत कोशों की आवश्यकता है। यह लेख भाषावैज्ञानिकों, ग्रन्थ सम्पादकों और सांस्कृतिक इतिहासकारों को भाषा के विकास और सामाजिक‑धार्मिक संदर्भों को समझने में नई सामग्री प्रदान करता है।
Conclusion
लेख से स्पष्ट होता है कि वसुदेवहिण्डी जैसी कथाओं में प्रयुक्त शब्दावली प्राकृत भाषा की जीवंतता और सामाजिक विविधता को प्रतिबिम्बित करती है। इन अप्रयुक्त शब्दों को कोशों में सम्मिलित करने से न केवल ग्रन्थ सम्पादन में सुविधा होगी बल्कि मध्यकालीन समाज के जीवन, आस्थाओं और व्यवहारों को समझने में भी सहायता मिलेगी।