Browse articles

जैन कर्म.... बन्धन और मुक्ति की प्रक्रिया

By Sagarmal Jain

Vol. 9 · No. 1-4April 1980 - January 1981pp. 1-12Hindi

Summary

यह लेख जैन कर्म सिद्धान्त का विस्तार से परिचय कराता है और बताता है कि आत्मा किस प्रकार कर्मों के कारण बन्धन में पड़ती है तथा उनसे मुक्ति कैसे पाती है। लेखक समझाते हैं कि कर्म मात्र नैतिक परिणाम नहीं बल्कि सूक्ष्म द्रव्य कण हैं जो भावों और कृत्यों के कारण आत्मा से चिपक जाते हैं। लेख में कर्मों को घातिया और अघातिया वर्गों में विभक्त किया गया है तथा आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष की प्रक्रिया को क्रमशः समझाया गया है। आस्रव यानी आत्मा में कर्मों का प्रवाह मिथ्या‑दर्शन, अवज्ञान, प्रमाद और कषायों के कारण होता है; बन्ध में वे कर्म चिपक जाते हैं; संवर में सही आचरण व तप से नया कर्म प्रवाह रुकता है; निर्जरा में तप, ध्यान, स्वाध्याय और सेवा से संचित कर्म धीरे‑धीरे क्षय होते हैं और अन्त में जब सारे कर्म नष्ट हो जाते हैं तो आत्मा केवली ज्ञान पाकर मोक्ष प्राप्त करती है। लेखक जैन आगमों और टीकाओं के उद्धरण देकर बताते हैं कि पाँच महाव्रतों का पालन, संयम, उपवास, ध्यान, प्रायश्चित तथा भक्ति कर्म निर्जरा के साधन हैं। वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि कर्म सिद्धान्त व्यक्ति को निष्क्रिय नहीं बनाता बल्कि आत्म‑संयम और सतत जागरूकता की प्रेरणा देता है। अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के पालन से आत्मा शुद्ध होती है और संसार के बन्धन से मुक्त हो सकती है। इस प्रकार लेख कर्म सिद्धान्त को नैतिक जीवन, आध्यात्मिक साधना और ब्रह्माण्डीय न्याय के समन्वित दृष्टिकोण के रूप में प्रस्तुत करता है।

Conclusion

लेख का निष्कर्ष यह है कि जैन कर्म सिद्धान्त आत्म‑उत्तरदायित्व पर आधारित है और मोक्ष का मार्ग किसी बाहरी कृपा से नहीं बल्कि सही दृष्टि, ज्ञान और आचरण से प्रशस्त होता है। कर्म को सूक्ष्म द्रव्य मानते हुए जैन दर्शन व्यक्ति को सचेतक अभ्यास और संयमित जीवन की प्रेरणा देता है। इस सिद्धान्त की व्यावहारिकता अनेक तप, व्रत और ध्यान से स्पष्ट होती है और यह दर्शाता है कि आत्मा स्वयं अपने बन्धन काट सकती है।

Article order

In this issue

Vol. 9 · No. 1-4
1-39Haribhadra’s Synthesis of YogaShantilal M. Desai1-12जैन कर्म.... बन्धन और मुक्ति की प्रक्रियाSagarmal JainCurrent article1-95नरसिंह महेताना पदUnexhibited13-26जैन यक्षी अजिता (या रोहिणी) का प्रतिमानिरूपणSagarmal Jain27-33पाइअ-सद्द-महण्णवो में अनुपलब्ध वसुदेवहिण्डी की शब्दावलीK. R. Chandra34-35राणकपुर का प्राचीनतम उल्लेखRam Vallabh Somani36-39कर्मप्रकृति-टीकानी एक अमूल्य हस्तप्रतिMuniraj Shree Vidyavijaya40-51Buddhist and Jaina Concepts of Man and Society as Revealed in Their Religious LiteraturePadmanabh S. Jaini40-66श्रीन्यायसिद्धान्तप्रवेशकन्थिकाMuni Shilachandravijay52-55Haoma as a Plant in Avestan TextS. N. Ghosal56-68Main Features of Mahavira’s ContributionsSuzuko Ohira67-68पंचाख्यान के संशोधक पूर्णभद्रसूरि खरतर पूर्णभद्र नहीं थेAgar Chand Nahata69-75Note on Ayaramga-SuttaMichihiko Yajima69-71कविवर नयसुन्दर एक अज्ञात रचना-नेमिनाथ वसंत विलासAgar Chand Nahata72-93स्वाध्याय-ReviewsHarivallabh Chunilal Bhayani, Nagin J Shah, Yajneshwar S. Shastri76-84Uttarajjhayana and Socio-Religious FormalismRam Prakash Poddar85-91Ajnapatra and Sanskrit Works on Polity-A ComparisonGanesh Thite92-95Some Special Aspects of jaina Philosophy as a School of Indian PhilosophyArvind Sharma94-96आ. जिनप्रभसूरि विरचित अंतरंग रासR. M. Shah96-103Parmara Sculpture in the British Museum-Vagdevi or Yakshi AmbikaKirit Mankodi

Original PDF

Inline viewer

Checking source PDF

The viewer will load here if the archive file is reachable.

Continue reading

Related articles

Sambodhi

Uttaradhyayansutra mein Pratipadit Karma‑Mimansa

By Kamal Kumar Jain

2004
Jain Vidya

श्री वीरसेनाचार्य (आधुनिक न्यायशास्त्र के संदर्भ में )

By प्रोफेसर एल.सी. जैन, कु. प्रभा जैन

November - 1993 to April - 1994
Jain Vidya

सिद्धान्तचक्रवर्ती के 'गोम्मटसार' का कर्मकाण्ड : कर्मसिद्धान्त का प्रामाणिक सन्दर्भ

By विद्यावाचस्पति डॉ. श्रीरंजनसूरिदेव, आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती

April - 1997 - 1998
Jain Journal A Quarterly on Jainology

Problems of the Purva

By Suzuko Ohira

Oct - 1980
The Jaina Gazette

The Attributes Of The Soul

By Rikhab Dass Jain

January - 1927
Jain Journal A Quarterly on Jainology

The Jaina Concept of Karma

By J. C. Sikdar

Oct - 1980