जैन यक्षी अजिता (या रोहिणी) का प्रतिमानिरूपण
By Sagarmal Jain
Summary
यह शोध‑पत्र जैन परम्परा में बारहवें तीर्थंकर वासुपूज्य की यक्षी अजिता, जिसे कुछ स्थानों पर रोहिणी भी कहा जाता है, की प्रतिमा‑निर्मिति और रूप‑विधान का विश्लेषण करता है। लेखक पुरातात्विक स्थलों से प्राप्त प्रतिमाओं, साहित्यिक विवरणों और शिलालेखों के आधार पर यक्षी के विशिष्ट चिन्हों की पहचान करते हैं। अजिता/रोहिणी को कमलासन पर बैठे हुए, दो भुजाओं में लता या फल धारण किये, और कभी‑कभी बालक को गोद में लिए दिखाया गया है, जो उसे मातृत्व और समृद्धि की देवी के रूप में दर्शाता है। आलेख में अम्बिका और पद्मावती जैसी अन्य यक्षियों से तुलना करते हुए बताया गया है कि अजिता की आकृति अधिक सरल और शांत है तथा उसके साथ उपस्थित सहचर यक्षों की संख्या भी भिन्न होती है। विभिन्न प्रदेशों—गुजरात, राजस्थान और मध्य भारत—की प्रतिमाओं में शैलीगत अंतर दिखाकर लेखक काल निर्धारण का प्रयास करते हैं। साथ ही, इन प्रतिमाओं के पीछे विद्यमान जनश्रुतियों और पूजा परम्पराओं की चर्चा कर बताया गया है कि यक्षी‑पूजा जैन धर्म में लौकिक अभिलाषाओं की पूर्ति और आध्यात्मिक संरक्षण दोनों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती थी। शोध‑पत्र इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि अजिता/रोहिणी की प्रतिमाएँ जैन और लोक दोनों परम्पराओं के संमिश्रण का सुन्दर उदाहरण हैं और इनके संरक्षण एवं अध्ययन की आवश्यकता है।
Conclusion
अजिता/रोहिणी की प्रतिमाओं का अध्ययन दर्शाता है कि जैन मूर्तिकला में देवियों का रूप बहुआयामी है और वह आसपास की लोक परम्पराओं से प्रभावित होता रहा है। यह शोध प्रतिमा विज्ञान के माध्यम से सांस्कृतिक अन्तर्क्रिया को समझने में सहायता करता है और मंदिर कला के संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करता है।