पंचाख्यान के संशोधक पूर्णभद्रसूरि खरतर पूर्णभद्र नहीं थे
By Agar Chand Nahata
Summary
इस लेख में जैन ग्रन्थ ‘पंचाख्यान’ के सम्पादक या संशोधक पूर्णभद्रसूरि की पहचान पर पुनर्विचार किया गया है। परम्परागत रूप से इसे खरतर गच्छ के पूर्णभद्रसूरि से जोड़ा जाता रहा है, परन्तु लेखक पाण्डुलिपियों के कोलफॉनों, ऐतिहासिक साक्ष्यों और doctrinal भिन्नताओं के आधार पर तर्क देते हैं कि ‘पंचाख्यान’ के पूर्णभद्र किसी अन्य परम्परा के मुनि थे। लेख में विभिन्न कालों में ज्ञात कई ‘पूर्णभद्र’ नामधारी साधुओं की जीवनियां, रचनाकाल और भाषाशैली की तुलना की गयी है और यह दिखाया गया है कि पंचाख्यान के टीकाकार की भाषा और विचारधारा खरतर गच्छ की विशिष्टताओं से मेल नहीं खाती। इस पुनर्विश्लेषण का उद्देश्य ग्रन्थ के सही रचनाकार को पहचान कर ग्रन्थों के श्रेयांकन में स्पष्टता लाना है, जिससे जैन साहित्य के इतिहास को अधिक सटीक रूप से समझा जा सके।
Conclusion
लेख से स्पष्ट होता है कि लेखकत्व निर्धारण में पाण्डुलिपि‑सम्बन्धी साक्ष्यों और ऐतिहासिक प्रसंगों का अध्ययन अनिवार्य है। ‘पंचाख्यान’ के मामले में यह पुनर्मूल्यांकन न केवल सही सम्पादक की पहचान स्थापित करता है बल्कि जैन साहित्यिक परम्पराओं की विविधता और उनके विकास को समझने में भी योगदान देता है।