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श्रीन्यायसिद्धान्तप्रवेशकन्थिका

By Muni Shilachandravijay

Vol. 9 · No. 1-4April 1980 - January 1981pp. 40-66Hindi

Summary

यह लेख ‘न्यायसिद्धान्तप्रवेशकन्थिका’ नामक ग्रन्थ का परिचय और विश्लेषण करता है, जो जैन तर्कशास्त्र और ज्ञानमीमांसा का प्रवेशिका रूप है। लेखक ग्रन्थ के अध्यायों का संक्षेप में वर्णन करते हैं, जिनमें प्रमाणों की परिभाषा, विभिन्न नयों (Standpoints), स्यादवाद की सात भंगियाँ, शाब्दिक और वास्तविक ज्ञान का अंतर तथा कुतर्कों के प्रकार शामिल हैं। लेख में बताया गया है कि यह कन्थिका नयाय और बौद्ध तर्कशास्त्र के बीच जैन दृष्टिकोण को स्पष्ट करती है, जिसमें प्रत्येक्ष और परोक्ष ज्ञान के साधन, अनेकान्तवाद और दृष्टि‑समुचितवाद का विश्लेषण किया गया है। लेखक ग्रन्थ की शैली की प्रशंसा करते हैं कि यह विद्यार्थियों के लिए सुबोध तरीके से जटिल अवधारणाओं को समझाता है और उदाहरणों के माध्यम से युक्ति‑दोषों का निरसन करता है। साथ ही, इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए सम्भावित रचनाकार और काल का अनुमान प्रस्तुत किया गया है। लेख में ग्रन्थ की तुलना अन्य जैन तर्कग्रन्थों से की गयी है और दिखाया गया है कि किस प्रकार इस कन्थिका ने बाद के विद्वानों को प्रभावित किया।

Conclusion

तर्कशास्त्र पर केन्द्रित इस ग्रन्थ का अध्ययन बताता है कि जैन विद्वानों ने न केवल नैतिकता बल्कि तार्किक विधियों में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। ‘न्यायसिद्धान्तप्रवेशकन्थिका’ जैसे ग्रन्थ भारतीय दर्शन में जैन तर्कपद्धति की सूक्ष्मता को उजागर करते हैं और आधुनिक विद्वानों को तर्क और अनेकान्तवाद के सम्बन्ध को समझने में सहायता प्रदान करते हैं।

Article order

In this issue

Vol. 9 · No. 1-4
1-39Haribhadra’s Synthesis of YogaShantilal M. Desai1-12जैन कर्म.... बन्धन और मुक्ति की प्रक्रियाSagarmal Jain1-95नरसिंह महेताना पदUnexhibited13-26जैन यक्षी अजिता (या रोहिणी) का प्रतिमानिरूपणSagarmal Jain27-33पाइअ-सद्द-महण्णवो में अनुपलब्ध वसुदेवहिण्डी की शब्दावलीK. R. Chandra34-35राणकपुर का प्राचीनतम उल्लेखRam Vallabh Somani36-39कर्मप्रकृति-टीकानी एक अमूल्य हस्तप्रतिMuniraj Shree Vidyavijaya40-51Buddhist and Jaina Concepts of Man and Society as Revealed in Their Religious LiteraturePadmanabh S. Jaini40-66श्रीन्यायसिद्धान्तप्रवेशकन्थिकाMuni ShilachandravijayCurrent article52-55Haoma as a Plant in Avestan TextS. N. Ghosal56-68Main Features of Mahavira’s ContributionsSuzuko Ohira67-68पंचाख्यान के संशोधक पूर्णभद्रसूरि खरतर पूर्णभद्र नहीं थेAgar Chand Nahata69-75Note on Ayaramga-SuttaMichihiko Yajima69-71कविवर नयसुन्दर एक अज्ञात रचना-नेमिनाथ वसंत विलासAgar Chand Nahata72-93स्वाध्याय-ReviewsHarivallabh Chunilal Bhayani, Nagin J Shah, Yajneshwar S. Shastri76-84Uttarajjhayana and Socio-Religious FormalismRam Prakash Poddar85-91Ajnapatra and Sanskrit Works on Polity-A ComparisonGanesh Thite92-95Some Special Aspects of jaina Philosophy as a School of Indian PhilosophyArvind Sharma94-96आ. जिनप्रभसूरि विरचित अंतरंग रासR. M. Shah96-103Parmara Sculpture in the British Museum-Vagdevi or Yakshi AmbikaKirit Mankodi

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