आ. जिनप्रभसूरि विरचित अंतरंग रास
By R. M. Shah
Summary
यह लेख चौदहवीं शती के प्रसिद्ध जैन मुनि जिनप्रभसूरि द्वारा रचित ‘अंतरंग रास’ की समीक्षा करता है। जिनप्रभसूरि अपनी ‘विविधतीर्थकल्प’ के लिए जाने जाते हैं, परन्तु यह रास स्वरूप रचना अपेक्षाकृत अल्पज्ञात है। रास एक ऐसी काव्य विधा है जिसमें गीत, नृत्य और कथा का संयोजन होता है। ‘अंतरंग रास’ में आत्मा के अंतरंग संघर्ष—कषायों और पुण्यों के बीच द्वंद्व—को रूपकात्मक ढंग से प्रस्तुत किया गया है। लेखक जिनप्रभसूरि के जीवन और अन्य रचनाओं का संक्षिप्त परिचय देते हैं, फिर रास की कथा, रूपकों, भाषा (पुरानी गुजराती/राजस्थानी) और छन्दों का विश्लेषण करते हैं। तुलना की दृष्टि से इसे अन्य जैन रसों से अलग ठहराया गया है और इसकी didactic विशेषता पर प्रकाश डाला गया है। यह अध्ययन दिखाता है कि जैन साहित्य में devotional रस विधा कितनी विविध थी और कैसे मुनियों ने काव्य के माध्यम से आध्यात्मिक संदेश प्रसारित किये।
Conclusion
‘अंतरंग रास’ जैसे अल्पज्ञात रचनाओं का अध्ययन जैन साहित्य की विधागत विविधता को उजागर करता है। जिनप्रभसूरि की यह रचना आध्यात्मिक संघर्ष को काव्यात्मक रूप देकर साधकों को प्रेरित करती है और मध्यकालीन पश्चिमी भारत में रास परम्परा की सर्जनात्मकता को दिखाती है।