ज्ञान-क्षेय मीमांसा – जैन दर्शन का वैशिष्ट्य
By Alpana Jain
Summary
यह लेख जैन दर्शन में ज्ञान और क्षेय (नाश) की मीमांसा पर आधारित है। जैन परिभाषा के अनुसार ज्ञान अनेक प्रकार का होता है—मति ज्ञान, श्रुत ज्ञान, अवधि ज्ञान, मनःपर्यव ज्ञान और केवल ज्ञान—और प्रत्येक आत्मा में उसकी क्षमता सन्निहित है। क्षेय शब्द यहाँ उन कर्मों और आवरणों के नाश को सूचित करता है जो ज्ञान की अभिव्यक्ति में बाधा डालते हैं। लेखक बताता है कि कैसे सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र के साधन से आत्मा क्रमशः कर्म‑आवरणों को क्षीण कर केवल ज्ञान प्राप्त कर सकती है। लेख में जैन आगम, तत्त्वार्थसूत्र और अन्य प्रकरणों से उदाहरण देकर दर्शाया गया है कि ज्ञान की शुद्धि स्वयं मोक्ष का मार्ग है। साथ ही अन्य दर्शनों—विशेष रूप से बौद्ध और वेदांत—से तुलना करते हुए जैन दृष्टिकोण की विशिष्टता स्पष्ट की गई है। लेखक ने यह भी बताया कि ज्ञान‑क्षेय का सिद्धान्त केवल दार्शनिक नहीं बल्कि व्यावहारिक साधना का आधार है।
Conclusion
ज्ञान‑क्षेय मीमांसा से यह स्पष्ट होता है कि जैन दर्शन में ज्ञान और आत्मशुद्धि अपरिहार्य रूप से जुड़े हैं। सही दृष्टि और आचरण से अज्ञानात्मक आवरणों का क्षय होता है और आत्मा अपने मूल स्वभाव को पहचान लेती है। यह लेख निष्कर्ष निकालता है कि यह सिद्धान्त आज भी साधकों के लिए प्रेरक मार्गदर्शक है और इसकी तुलना अन्य दर्शनों से समझ को और समृद्ध कर सकती है।