वैशेषिक दर्शन में दुःख का स्वरूप तथा प्रो. पाहिकृत दुःखवर्गीकरण की महत्ता
By Dharmachand Jain
Summary
धर्म चन्द जैन के इस लेख में वैशेषिक दर्शन में दुःख के स्वरूप पर विचार किया गया है और प्रोफेसर पाहि द्वारा प्रस्तावित दुःख के वर्गीकरण की विशेषताओं को रेखांकित किया गया है। लेखक बताते हैं कि भारतीय परम्परा में दुःख का अनुभव चेतन आत्मा में ही सम्भव है और सभी दर्शनों ने दुःख के उद्भव और निवारण के कारणों पर चिंतन किया है। बौद्ध दर्शन में दुःख को चार आर्य सत्यों में प्रमुख स्थान प्राप्त है; सांख्य में इसे प्रकृति का गुण माना गया है; जैन दर्शन में इसे वेदनीय कर्म के उदय से उत्पन्न माना जाता है; और वेदान्त में अज्ञान का परिणाम समझा जाता है। वैशेषिक दर्शन के अनुसार दुःख आत्मा का धर्म नहीं बल्कि अधर्म रूप कर्म का फल है। लेखक प्रो. पाहिकृत दुःखवर्गीकरण का परिचय देते हैं जिसमें दुःख को शारीरिक, मानसिक, आधिदैविक और आधिभौतिक आदि वर्गों में विभक्त किया गया है। यह वर्गीकरण दुःख के विविध कारणों और उपचारों को समझने में सहायक है। जैन इस वर्गीकरण की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहते हैं कि इससे दर्शनशास्त्रियों को दुःख के निवारण के मार्ग तलाशने में सुविधा मिलती है। लेख में यह भी प्रतिपादित किया गया है कि सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान के माध्यम से समभाव साधना करके ही दुःख से स्थायी मुक्ति सम्भव है। इस प्रकार यह लेख भारतीय दार्शनिक परम्पराओं में दुःख की अवधारणा को समन्वित दृष्टि से प्रस्तुत करता है और वैशेषिक दृष्टिकोण को विशेष रूप से उजागर करता है।
Conclusion
लेख से स्पष्ट होता है कि वैशेषिक दर्शन दुःख को आत्मा का मूल गुण नहीं मानता और प्रो. पाहि द्वारा किया गया वर्गीकरण दुःख के अध्ययन में उपयोगी सिद्ध होता है। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और समभाव के अभ्यास से ही दुःख के अंतिम निवारण का मार्ग प्रशस्त होता है।