ब्रह्मकारणतावाद एवं सृष्टि : एक आलोचना
By Sureshwar Meher
Summary
सुरेश्वर मेहेर का यह लेख शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त के उस सिद्धान्त की आलोचना करता है जिसमें ब्रह्म को जगत का एकमात्र कारण माना गया है। लेखक सबसे पहले ब्रह्म की परिभाषा देते हैं जिसके अनुसार ब्रह्म वह सर्वव्यापक, सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान सत्ता है जिससे नाम‑रूपात्मक जगत की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होती है। शंकर का मत है कि ब्रह्म असंग, निर्विकारी और निष्क्रिय है; जगत मात्र मायिक प्रपंच है जिसका ब्रह्म से कोई वास्तविक संबंध नहीं। मेहेर इस अद्वैतवादी दृष्टिकोण की समीक्षा करते हुए कहते हैं कि यदि ब्रह्म और जगत में अनन्यत्व है तो कारण‑कार्य संबंध कैसे समझें। वे शंकर के विवर्तवाद—जिसमें जगत ब्रह्म का प्रतिविम्ब माना गया है—पर प्रश्न उठाते हैं और विचार करते हैं कि ब्रह्म में कार्य की इच्छा और उत्पत्ति का संसर्ग कैसे सम्भव है। लेख में वैष्णव और न्याय दर्शनों के विचारों का भी संकेत किया गया है, जिनमें जगत को वास्तविक माना गया है और ईश्वर को उपादान तथा निमित्त कारण के रूप में स्वीकार किया गया है। लेखक का निष्कर्ष है कि ब्रह्मकारणतावाद की दार्शनिक जटिलताएँ इसे तर्कसंगत सिद्ध नहीं करतीं और सृष्टि की समझ के लिए बहुलवादी दृष्टि आवश्यक है।
Conclusion
लेख दर्शाता है कि शंकराचार्य का ब्रह्मकारणतावाद कई दार्शनिक कठिनाइयों से घिरा है। ब्रह्म को निर्विकारी मानते हुए भी उसे जगत का कारण मानना तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता। सृष्टि की व्याख्या में बहुलवादी दृष्टिकोण अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।