आचार्य हेमचंद्रसूरि कृत भवभावना ग्रंथ : एक परिचय
By Sadhvishree Priyashubhanjanashree
Summary
साध्वीश्री प्रियाशुभांजनाश्री द्वारा लिखा गया यह लेख आचार्य हेमचंद्रसूरि की कृति 'भवभावना ग्रंथ' का परिचय देता है। यह ग्रंथ ५३१ गाथाओं में रचित है और उसकी भाषा प्राकृत है। लेखक बताती हैं कि मलधारी हेमचंद्रसूरि ने इस ग्रंथ पर संस्कृत तथा प्राकृत में स्वयं टीका लिखी है जिससे कठिन शब्दार्थ और गूढ़ तत्त्व सहज समझ में आते हैं। ग्रंथ में परोपकार को दो प्रकार—द्रव्य परोपकार और भाव परोपकार—में विभाजित कर द्रव्य परोपकार की सीमाओं और भाव परोपकार की महिमा को वर्णित किया गया है। भाव परोपकार, अर्थात जिनधर्म का उपदेश देना, सभी सुखों का कारण बताया गया है। लेख में भवभावना की उपमा चलनी से दी गई है जो कर्म रूपी रज को छानकर विवेक रूपी रत्न प्रदान करती है। ग्रंथ दो भागों में विभक्त है; प्रथम भाग में मंगलाचरण, परोपकार और भवभावना की महिमा वर्णित है, जबकि दूसरे भाग में तीर्थंकर नेमिनाथ के चरित्र, संसार की अनित्यता, और संसार से विरक्ति के भाव को निरूपित किया गया है। लेखक भवभावना ग्रंथ को मनोविज्ञान और आध्यात्मिक अभ्यास के बीच सेतु के रूप में देखती हैं, क्योंकि इसका उद्देश्य आत्मा में संवेदना और वैराग्य उत्पन्न करना है।
Conclusion
भवभावना ग्रंथ का परिचय हमें बताता है कि यह कृति केवल धार्मिक पाठ नहीं बल्कि आत्मिक जागरण का साधन है। गाथाओं और टीका के माध्यम से आचार्य हेमचंद्रसूरि ने परोपकार, विवेक और वैराग्य के महत्त्व को समझाया है, जो आज भी प्रासंगिक हैं।