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अन्य दर्शनों के ज्ञान की आवश्यकता

By Veersagar Jain

Vol. 41Dec-18pp. 104-108Hindi

Summary

वीरसागर जैन इस लेख में तत्त्वज्ञान की निर्मलता के लिए अन्य दर्शनों का ज्ञान आवश्यक बताते हैं। वे कहते हैं कि प्राचीन भारत में विद्वान केवल अपने मत का अध्ययन नहीं करते थे बल्कि विरोधी मतों को भी समझते थे, क्योंकि शास्त्रों में पूर्व पक्ष और उत्तर पक्ष की पद्धति अपनाई जाती थी। पूर्व पक्ष में प्रतिपक्षी दर्शन की मान्यताओं को सुस्पष्ट रूप से रखा जाता था और उत्तर पक्ष में उनका खण्डन करके अपना सिद्धान्त स्थापित किया जाता था। यदि अध्ययनकर्ता पूर्व पक्ष को समझे बिना उत्तर पक्ष पढ़े तो तर्क और निष्कर्ष सही प्रकार से ग्रहण नहीं कर सकता। लेखक विभिन्न सूत्रों का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि एक‑एक पद में विभिन्न दर्शनों की मान्यताओं का खण्डन निहित होता है, इसलिए अन्य मतों का ज्ञान आवश्यक है। वे इस मानसिकता की आलोचना करते हैं कि दूसरे दर्शन का अध्ययन समय की बर्बादी है। लेख का संदेश है कि बौद्ध, सांख्य, न्याय, वेदान्त, जैन इत्यादि सभी दर्शनों का परस्पर अध्ययन दर्शनिक दृष्टि की व्यापकता और सहनशीलता को बढ़ाता है।

Conclusion

लेख इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि अन्य दर्शनों का ज्ञान न केवल अपने दर्शन की गहन समझ के लिए आवश्यक है बल्कि यह विचार‑विमर्श को समृद्ध और समन्वित बनाता है। दर्शनशास्त्र में वैचारिक उदारता और परस्पर अध्ययन की परम्परा पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।

Article order

In this issue

Vol. 41
1-10Reflections on Manuscriptology: Forays into Indian Paradigms of Knowledge ManagementDipti Tripathi11-26Kathakautukam: Sanskrit rendering of Persian Yusuf‑Zulaykha of JamiBalram Shukla27-35Consciousness in Philosophy of Advaita, Viśiṣṭādvaita, Dvaita and Śaivism with synoptic view of other philosophical traditionsSushim Dubey36-40A Note on Murari’s version of the Rama‑StoryCharulata Verma41-64Plant Propagation as described in Sanskrit TextsDhananjay Vasudeo Dwivedi65-78The Jains in AhmedabadJitendra B. Shah79-85वैशेषिक दर्शन में दुःख का स्वरूप तथा प्रो. पाहिकृत दुःखवर्गीकरण की महत्ताDharmachand Jain86-90आचार्य हेमचंद्रसूरि कृत भवभावना ग्रंथ : एक परिचयSadhvishree Priyashubhanjanashree91-103ब्रह्मकारणतावाद एवं सृष्टि : एक आलोचनाSureshwar Meher104-108अन्य दर्शनों के ज्ञान की आवश्यकताVeersagar JainCurrent article109-117लिङ्गपुराण का योगदर्शनSatyavrat Verma118-137संस्कृत तथा फारसी के क्रियापदों में साम्यMohit Kumar Mishra138-144श्रीदयानन्दचरितममहाकाव्यम्‌: एक समीक्षाHemvati Nandan Sharma145-154मुसव्विरी के मुकाम और राजस्थानJyoti Kumawat155-162कांगड़ा शैली में नायिका‑भेद अंकनRitika Garg163-168लोक कला के नये मुहावरे गढ़ते : यामिनी राय के चित्रRajendra Prasad169-176आचार्य हेमचंद्रसूरि कृत भवभावना ग्रंथ और मनोविज्ञानSadhvishree Priyashubhanjanashree177-187ભારતીય તત્ત્વજ્ઞાનની રૂપરેખાSukhlalji Sanghavi188-205શ્રુતસાધનામાં સાધ્વીજી ભગવંતોનું પ્રદાનMuni Vairagyarativijay Gani206-211રઘુવિલાસમાં નિરૂપિત જીવનબોધBhailalbhai G. Patel212-216જૈન સંપ્રદાયમાં "સ્તવન"નું માહાત્મ્યBhagwan S. Choudhary217-243પુરાતત્ત્વાચાર્ય મુનિ શ્રી જિનવિજયજી (૨૭, જાન્યુ. ૧૮૮૮ – ૩, જૂન ૧૯૭૬)Ramesh Oza

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