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आचार्य हेमचंद्रसूरि कृत भवभावना ग्रंथ और मनोविज्ञान

By Sadhvishree Priyashubhanjanashree

Vol. 41Dec-18pp. 169-176Hindi

Summary

साध्वीश्री प्रियाशुभांजनाश्री इस लेख में भवभावना ग्रंथ को मनोविज्ञान के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित करती हैं। वे मन को विचार करने की शक्ति मानते हुए कहती हैं कि मन, शरीर और आत्मा के साथ तीसरा तत्व है। जैन दर्शन में मन को दो भागों—द्रव्य मन और भाव मन—में बांटा गया है; द्रव्य मन भौतिक तत्वों से निर्मित है जबकि भाव मन चेतन धारा है। लेख में आधुनिक मनोविज्ञान के तीन स्तर—चेतन, अर्धचेतन और अचेतन मन—की तुलना जैन अवधारणाओं से की गई है। लेखक यह बताती हैं कि भवभावना ग्रंथ में आत्मा को विवेक और वैराग्य की प्रेरणा देने के लिए जगत और शरीर की अनित्यता का विचार कराया गया है, जिससे मन में संवेग और निर्वेद जैसे गुण उत्पन्न होते हैं। ग्रंथ में नेमिनाथ तीर्थंकर के चरित्र का वर्णन कर मनोवैज्ञानिक दृष्टि से उसकी व्याख्या की गयी है। लेख में ध्यान, मनन और समत्व की साधना द्वारा मन पर नियंत्रण तथा भावों के परिष्कार की महत्ता स्पष्ट की गई है। इस प्रकार भवभावना ग्रंथ धर्म और मनोविज्ञान का सेतु बन जाता है जो साधक को आत्मानुभूति की ओर ले जाता है।

Conclusion

यह लेख दिखाता है कि जैन ग्रंथों में मनोविज्ञान की परम्परा निहित है। भवभावना ग्रंथ मनोविज्ञान और आध्यात्मिक साधना को जोड़ता है तथा मन की उन्नति द्वारा आत्मा की मुक्ति का मार्ग सुझाता है।

Article order

In this issue

Vol. 41
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