श्रीदयानन्दचरितममहाकाव्यम्: एक समीक्षा
By Hemvati Nandan Sharma
Summary
हेमवती नन्दन शर्मा द्वारा रचित यह समीक्षा ग्रन्थकार आचार्य रमाकान्त उपाध्याय के महाकाव्य 'श्रीदयानन्दचरितममहाकाव्यम्' पर केन्द्रित है। यह महाकाव्य स्वामी दयानन्द सरस्वती के जीवन पर आधारित है और बीस सर्गों में विभक्त है। शर्मा सबसे पहले कवि के जीवन और पृष्ठभूमि का परिचय देते हैं—रमाकान्त उपाध्याय उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जनपद के झों आरा गाँव में जन्मे, विद्वान और वैदिक परम्परा के अनुयायी थे। समीक्षा में महाकाव्य की संरचना, कथानक और भाषा‑शैली का विश्लेषण किया गया है। प्रत्येक सर्ग में दयानन्द के जन्म, शिक्षण, मांस‑मदिरा के विरोध, बालविवाह और मूर्ति‑पूजा के खण्डन, शास्त्रार्थ और समाजसुधार के प्रयासों का वर्णन है। लेखक रस‑विमर्श का विस्तृत विश्लेषण करते हैं; काव्य में श्रृंगार, वीर, करुण आदि रसों की अभिव्यक्ति देखी जाती है परन्तु स्वामी दयानन्द के तेजस्वी और सुधारक व्यक्तित्व के कारण वीर रस की प्रधानता है। शर्मा छन्द योजना, अलंकार, उपमा और दृष्टान्तों की चर्चा करते हैं और महाकाव्य के काव्यगत गुणों को रेखांकित करते हैं। वे यह भी बताते हैं कि महाकाव्य में कथ्य और शैली का संतुलन है; ऐतिहासिक तथ्यों को poetic मुक्तता के साथ पिरोया गया है। लेख का निष्कर्ष है कि ‘श्रीदयानन्दचरितममहाकाव्यम्’ हिन्दी साहित्य में जीवन‑चरित महाकाव्यों की परम्परा को समृद्ध करता है और दयानन्द सरस्वती के आदर्शों का प्रभावी चित्रण प्रस्तुत करता है।
Conclusion
समीक्षा से स्पष्ट होता है कि 'श्रीदयानन्दचरितममहाकाव्यम्' केवल एक जीवनकथा नहीं बल्कि समाजसुधार और वैदिक पुनर्जागरण का घोष है। इसकी भाषा, शैली और रस योजना इसे हिन्दी महाकाव्य साहित्य में विशेष स्थान देती हैं।