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कुमारसम्भव में शिव-विषयक मिथक एवं अमूर्त शिवतत्त्व

By Vasantkumar M. Bhatt

Vol. 402017pp. 46-56Hindi

Summary

कवि कालिदास के प्रसिद्ध महाकाव्य “कुमारसम्भव” में शिव के स्वरूप और उनके मिथकीय कार्यों का अत्यन्त विविध वर्णन मिलता है। यह लेख उन्हीं कथाओं और रूपकों की विवेचना करता है। लेखक वसन्तकुमार म. भट्ट ने दिखाया है कि कैसे कालिदास ने वैदिक, पुराणिक और तान्त्रिक परम्पराओं से प्राप्त शिव‑कथाओं को अपने काव्य में गूँथ दिया। पर्वतपुत्री पार्वती से शिव का विवाह, कामदेव का दहन, तारकासुर का वध, कार्तिकेय का जन्म, दक्ष‑यज्ञ का ध्वंस और त्रिपुरासुर का वध जैसी घटनाएँ महाकाव्य में महत्त्वपूर्ण प्रसंग हैं। लेखक इन प्रसंगों के पीछे छिपे प्रतीकों की व्याख्या करते हुए बताता है कि शिव कभी भयानक संहारक तो कभी करुणामय गृहस्थ और योगी के रूप में प्रकट होते हैं। आलेख में शिव के अष्टमूर्ति अथवा आठ रूपों के उल्लेख के साथ “नन्दी‑पथ” स्तुतियों तथा भट्ट की टीका‑परम्परा के उद्धरण भी शामिल हैं। इन सबके माध्यम से लेख दिखाता है कि कालिदास केवल पौराणिक घटनाओं का नाट्य‑वर्णन नहीं करता बल्कि शैव तत्व की दार्शनिक अवधारणा की ओर संकेत करता है। शिव को “निस्संग ब्रह्म” और “समस्त विश्व के आधार” के रूप में देखने वाली आध्यात्मिक दृष्टि भी काव्य में समायी है। इसे स्पष्ट करने के लिए लेखक विभिन्न श्लोकों, संस्कृत नाट्यशास्त्र तथा अन्य टीकाकारों की व्याख्याओं का संदर्भ देता है और शिव‑पार्वती संवाद को आध्यात्मिक प्रतीकवाद के रूप में पढ़ने का सुझाव देता है।

Conclusion

लेख का निष्कर्ष यह है कि “कुमारसम्भव” में शिव के अनेक मिथकीय रूपों का वर्णन करते हुए कालिदास शैव दर्शन की गहनता भी सूक्ष्म रूप से प्रस्तुत करते हैं। शिव को कभी संहारक, कभी योगी और कभी गृहस्थ के रूप में चित्रित करके कवि बताता है कि परम तत्व निर्गुण और सगुण दोनों से परे है। वसन्तकुमार भट्ट के अनुसार इन मिथकों का उद्देश्य पाठक को कलात्मक रस के साथ‑साथ शिवतत्त्व की अमूर्त अनुभूति कराना है, जिससे साहित्यिक सौन्दर्य और आध्यात्मिक सन्देश एक साथ मिलते हैं।

Article order

In this issue

Vol. 40
1-13Influence of Kashmir on the Ritual Literature of OrissaG. C. Tripathi14-23Conceptual basis of Yoga therapy in Yogopanisats and TaittiriyopanisatSushim Dubey24-40Plant-Human Linkage as Depicted in Sanskrit LiteratureDhananjay Vasudeo Dwivedi41-45GaddalikapravahahSatyavrat Verma46-56कुमारसम्भव में शिव-विषयक मिथक एवं अमूर्त शिवतत्त्वVasantkumar M. BhattCurrent article57-65कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्रसूत्रि विरचित योगशास्त्र में ध्यानJitendra B. Shah66-94जैन संस्कृत व्याकरण परम्पराBalram Shukla95-107जैन परम्परा में धर्मध्यानDharmachand Jain108-113कच्चायनपाणिनिव्याकरणयोः कारककरणाय तुलनात्मक अध्ययनShweta Jain114-131संस्कृत स्वरों का मुक्तविकल्पन तथा प्राकृत भाषाएँSuhasani132-136प्राकृत कथा साहित्य की परम्परा एवं प्रकारHemvati Nandan Sharma137-147ब्रह्माकुमारी दर्शन में “ईश्वर” की अवधारणाSureshwar Meher148-151हमारी जीवन शैली कैसी हो?Lata Surendra Bothra152-157पहाड़ी शैली में राधा‑कृष्ण अंकनRitika Garg158-160ग्रंथ समालोचना : Scientific Perspectives of Jainism – जैन धर्म के वैज्ञानिक दृष्टिकोणUnexhibited

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