कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्रसूत्रि विरचित योगशास्त्र में ध्यान
By Jitendra B. Shah
Summary
इस लेख में विद्वान जितेन्द्र बी. शाह ने कालिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्र द्वारा रचित “योगशास्त्र” में वर्णित ध्यान‑प्रकारों की विवेचना की है। हेमचन्द्राचार्य जैन साधु और महान व्याकरणाचार्य थे, जिन्होंने योग‑दर्शन की अपनी व्याख्या प्रस्तुत की। लेख में बताया गया है कि हेमचन्द्र ध्यान को आत्म‑शुद्धि का साधन मानते हैं और इसे आठ अंगों या विषयों में बाँटते हैं। वह “धारणा”, “ध्यान” और “समाधि” के पारम्परिक भेद को स्वीकार करते हैं, परंतु जैन दर्शन की आवश्यकताओं के अनुसार इन्हें पुनः परिभाषित करते हैं। लेखक प्राकृत गाथाओं, तत्त्वार्थसूत्र, मलिनिवैकालिका सूत्र और योगशास्त्र की विभिन्न गाथाओं के उद्धरण देकर ध्यान के चार प्रकार—आत्मविचय, गुणस्थान, प्रवचन तथा शुक्ल ध्यान—समझाता है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार मन को एकाग्र कर केश, लम्ब, आसन, श्वास, नाक आदि पर ध्यान केन्द्रित करना प्रारम्भिक साधक के लिए उपयुक्त है, जबकि तत्त्वज्ञान से युक्त ध्यान अध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है। लेख हेमचन्द्र के विचारों की तुलना पतंजलि योगसूत्र और बौद्ध ध्यान‑पद्धतियों से भी करता है तथा बताता है कि हेमचन्द्र ध्यान का प्रयोग न केवल आत्ममोक्ष के लिए बल्कि सामाजिक नैतिकता और अहिंसा के पालन हेतु भी करते हैं।
Conclusion
लेख के अंत में लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि हेमचन्द्राचार्य का “योगशास्त्र” ध्यान की जैन अवधारणा को सुव्यवस्थित करता है। वह ध्यान को केवल मानसिक अभ्यास न मानकर आध्यात्मिक अनुशासन, नैतिक नियंत्रण और सामाजिक कल्याण का साधन मानते हैं। ध्यान के विभिन्न प्रकारों के माध्यम से आत्मा की शुद्धि तथा कर्मों के क्षय का मार्ग प्रशस्त किया जाता है और यह जैन योग‑साधना की सम्पूर्णता को दर्शाता है।