Browse articles

कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्रसूत्रि विरचित योगशास्त्र में ध्यान

By Jitendra B. Shah

Vol. 402017pp. 57-65Hindi

Summary

इस लेख में विद्वान जितेन्द्र बी. शाह ने कालिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्र द्वारा रचित “योगशास्त्र” में वर्णित ध्यान‑प्रकारों की विवेचना की है। हेमचन्द्राचार्य जैन साधु और महान व्याकरणाचार्य थे, जिन्होंने योग‑दर्शन की अपनी व्याख्या प्रस्तुत की। लेख में बताया गया है कि हेमचन्द्र ध्यान को आत्म‑शुद्धि का साधन मानते हैं और इसे आठ अंगों या विषयों में बाँटते हैं। वह “धारणा”, “ध्यान” और “समाधि” के पारम्परिक भेद को स्वीकार करते हैं, परंतु जैन दर्शन की आवश्यकताओं के अनुसार इन्हें पुनः परिभाषित करते हैं। लेखक प्राकृत गाथाओं, तत्त्वार्थसूत्र, मलिनिवैकालिका सूत्र और योगशास्त्र की विभिन्न गाथाओं के उद्धरण देकर ध्यान के चार प्रकार—आत्मविचय, गुणस्थान, प्रवचन तथा शुक्ल ध्यान—समझाता है। इसमें बताया गया है कि किस प्रकार मन को एकाग्र कर केश, लम्ब, आसन, श्वास, नाक आदि पर ध्यान केन्द्रित करना प्रारम्भिक साधक के लिए उपयुक्त है, जबकि तत्त्वज्ञान से युक्त ध्यान अध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है। लेख हेमचन्द्र के विचारों की तुलना पतंजलि योगसूत्र और बौद्ध ध्यान‑पद्धतियों से भी करता है तथा बताता है कि हेमचन्द्र ध्यान का प्रयोग न केवल आत्ममोक्ष के लिए बल्कि सामाजिक नैतिकता और अहिंसा के पालन हेतु भी करते हैं।

Conclusion

लेख के अंत में लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि हेमचन्द्राचार्य का “योगशास्त्र” ध्यान की जैन अवधारणा को सुव्यवस्थित करता है। वह ध्यान को केवल मानसिक अभ्यास न मानकर आध्यात्मिक अनुशासन, नैतिक नियंत्रण और सामाजिक कल्याण का साधन मानते हैं। ध्यान के विभिन्न प्रकारों के माध्यम से आत्मा की शुद्धि तथा कर्मों के क्षय का मार्ग प्रशस्त किया जाता है और यह जैन योग‑साधना की सम्पूर्णता को दर्शाता है।

Article order

In this issue

Vol. 40
1-13Influence of Kashmir on the Ritual Literature of OrissaG. C. Tripathi14-23Conceptual basis of Yoga therapy in Yogopanisats and TaittiriyopanisatSushim Dubey24-40Plant-Human Linkage as Depicted in Sanskrit LiteratureDhananjay Vasudeo Dwivedi41-45GaddalikapravahahSatyavrat Verma46-56कुमारसम्भव में शिव-विषयक मिथक एवं अमूर्त शिवतत्त्वVasantkumar M. Bhatt57-65कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्रसूत्रि विरचित योगशास्त्र में ध्यानJitendra B. ShahCurrent article66-94जैन संस्कृत व्याकरण परम्पराBalram Shukla95-107जैन परम्परा में धर्मध्यानDharmachand Jain108-113कच्चायनपाणिनिव्याकरणयोः कारककरणाय तुलनात्मक अध्ययनShweta Jain114-131संस्कृत स्वरों का मुक्तविकल्पन तथा प्राकृत भाषाएँSuhasani132-136प्राकृत कथा साहित्य की परम्परा एवं प्रकारHemvati Nandan Sharma137-147ब्रह्माकुमारी दर्शन में “ईश्वर” की अवधारणाSureshwar Meher148-151हमारी जीवन शैली कैसी हो?Lata Surendra Bothra152-157पहाड़ी शैली में राधा‑कृष्ण अंकनRitika Garg158-160ग्रंथ समालोचना : Scientific Perspectives of Jainism – जैन धर्म के वैज्ञानिक दृष्टिकोणUnexhibited

Original PDF

Inline viewer

Checking source PDF

The viewer will load here if the archive file is reachable.

Continue reading

Related articles

Sambodhi

Jain darshan mein Nirjara Tatva

By Mukul Raj Mehta

2002
Jain Vidya

परद्रव्य

April - 1990