ग्रंथ समालोचना : Scientific Perspectives of Jainism – जैन धर्म के वैज्ञानिक दृष्टिकोण
By Unexhibited
Summary
यह ग्रंथ‑समीक्षा “Scientific Perspectives of Jainism” नामक पुस्तक का परिचय और मूल्यांकन प्रस्तुत करती है। पुस्तक में सम्पादक सामणी चैतन्य प्रज्ञा, नरेंद्र भंडारी और नारायणलाल कछारा ने जैन धर्म को विज्ञान की दृष्टि से समझने का प्रयास किया है। समीक्षा में बताया गया है कि ग्रंथ तीन भागों में विभाजित है; पहले भाग में जैन तत्त्वमीमांसा के मूल सिद्धांत—आत्मा, कर्म, कर्मफल, अहिंसा, अपरिग्रह—को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझाया गया है। दूसरे भाग में ब्रह्माण्ड, समय, पदार्थ और जीव विज्ञान के संदर्भ में जैन सिद्धांतों की तुलना आधुनिक भौतिकी, रसायन, जीव‑विज्ञान और पर्यावरण विज्ञान से की गई है। अंतिम भाग में जैन दर्शन की व्यावहारिक उपयोगिता जैसे आहार‑विज्ञान, योग, ध्यान, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और वैश्विक शांति जैसे विषयों पर अध्याय हैं। पुस्तक में 33 परिच्छेद और 657 पृष्ठ हैं, तथा प्रत्येक अध्याय को विशेषज्ञ विद्वानों ने लिखा है। समीक्षा लेखक पुस्तकीय भाषा की सुलभता, चित्रों और तालिकाओं की उपयोगिता और संदर्भ ग्रंथों की उपलब्धता की सराहना करता है। कुछ अध्याय अंग्रेजी में और कुछ हिंदी में हैं, जिससे यह शोधार्थियों और साधारण पाठकों दोनों के लिए उपयोगी है। समीक्षक यह भी इंगित करता है कि कुछ विषयों में और अधिक गहराई हो सकती थी, परंतु कुल मिलाकर यह पुस्तक जैन सिद्धांतों को वैज्ञानिक समुदाय के सामने प्रस्तुत करने में सफल है।
Conclusion
समीक्षा के अनुसार “Scientific Perspectives of Jainism” एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है जो जैन धर्म के दार्शनिक सिद्धांतों को आधुनिक विज्ञान की भाषा में समझाने का सेतु बनाता है। इसमें अहिंसा, पर्यावरण संरक्षण और आत्मशुद्धि जैसे विचारों को वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ जोड़ा गया है, जिससे जैन दर्शन की प्रासंगिकता समकालीन समाज में और भी स्पष्ट होती है।