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हमारी जीवन शैली कैसी हो?

By Lata Surendra Bothra

Vol. 402017pp. 148-151Hindi

Summary

लता बोहरा का यह निबंध आधुनिक समाज में जीवन‑शैली के प्रश्न पर विचार करता है। लेख में कहा गया है कि वर्तमान भौतिकवादी युग में उपभोक्तावाद, पश्चिमी प्रभाव और प्रतियोगिता ने हमारे जीवन, सोच, कार्य और संबंधों को बहुत प्रभावित किया है और हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। लेखक पिछले कुछ दशकों में सामाजिक‑धार्मिक मूल्यों में आये परिवर्तन का उल्लेख करते हुए बताती हैं कि इस “क्रांति” ने प्राचीन मान्यताओं को झकझोर दिया है, जिसके कारण युवा वर्ग असमंजस में है। निबंध में धर्मों और संस्कृतियों द्वारा सिखाई गई जीवन की मूलभूत शिक्षा—जैसे प्रकृति के प्रति श्रद्धा, आत्म‑संयम, सहिष्णुता, करुणा, परिवार और समाज के प्रति कर्तव्य—की चर्चा की गयी है। लेख यह सुझाव देता है कि हमारी जीवन शैली ऐसी होनी चाहिए जिसमें प्राकृतिक संसाधनों का सम्मान हो, पर्यावरण के साथ सह-अस्तित्व हो, तथा आडम्बर और विलासिता की बजाय सादगी और संतुलन को अपनाया जाये। लेखक विश्वास करती हैं कि विज्ञान और तकनीक का उपयोग जनकल्याण हेतु होना चाहिए, न कि अंधाधुंध भोगविलास के लिए। युवा पीढ़ी को अपनी परम्पराओं की समझ, नैतिक मूल्यों का पालन और स्वस्थ जीवन‑शैली (संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, योग, ध्यान) अपनाना चाहिए।

Conclusion

निबंध का निष्कर्ष है कि एक आदर्श जीवन‑शैली वही है जो प्रकृति, समाज और आत्मा तीनों के प्रति उत्तरदायी हो। लता बोहरा के अनुसार, आधुनिक व्यक्ति को भौतिक सुखों के लालच से मुक्त होकर आत्म‑अनुशासन, पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों तथा पर्यावरणीय संतुलन को जीवन में उतारना चाहिए। ऐसा करने से जीवन सार्थक, स्वस्थ और संतुलित बन सकता है।

Article order

In this issue

Vol. 40
1-13Influence of Kashmir on the Ritual Literature of OrissaG. C. Tripathi14-23Conceptual basis of Yoga therapy in Yogopanisats and TaittiriyopanisatSushim Dubey24-40Plant-Human Linkage as Depicted in Sanskrit LiteratureDhananjay Vasudeo Dwivedi41-45GaddalikapravahahSatyavrat Verma46-56कुमारसम्भव में शिव-विषयक मिथक एवं अमूर्त शिवतत्त्वVasantkumar M. Bhatt57-65कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्रसूत्रि विरचित योगशास्त्र में ध्यानJitendra B. Shah66-94जैन संस्कृत व्याकरण परम्पराBalram Shukla95-107जैन परम्परा में धर्मध्यानDharmachand Jain108-113कच्चायनपाणिनिव्याकरणयोः कारककरणाय तुलनात्मक अध्ययनShweta Jain114-131संस्कृत स्वरों का मुक्तविकल्पन तथा प्राकृत भाषाएँSuhasani132-136प्राकृत कथा साहित्य की परम्परा एवं प्रकारHemvati Nandan Sharma137-147ब्रह्माकुमारी दर्शन में “ईश्वर” की अवधारणाSureshwar Meher148-151हमारी जीवन शैली कैसी हो?Lata Surendra BothraCurrent article152-157पहाड़ी शैली में राधा‑कृष्ण अंकनRitika Garg158-160ग्रंथ समालोचना : Scientific Perspectives of Jainism – जैन धर्म के वैज्ञानिक दृष्टिकोणUnexhibited

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