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कच्चायनपाणिनिव्याकरणयोः कारककरणाय तुलनात्मक अध्ययन

By Shweta Jain

Vol. 402017pp. 108-113Hindi

Summary

श्वेता जैन द्वारा लिखित यह शोध‑निबंध पालि व्याकरण “कच्चायन” और संस्कृत व्याकरण “पाणिनि” की तुलना कर दोनों में कारक‑करण सम्बन्धी नियमों का विवेचन करता है। कच्चायन व्याकरण बौद्ध पारंपरिक विद्या से सम्बद्ध है और उसमें कारकों की संख्या तथा स्वरूप पाणिनि से भिन्न हैं। लेख में बताया गया है कि कच्चायन ने कारकों को चार समूहों—कत्तु (कर्त्ता), काम (कर्म), कारण, आणि—में विभाजित किया है जबकि पाणिनि ने सप्त कारकों (कर्तृ, कर्म, करन, संप्रदान, अपादान, अधिकरण, संबन्ध) तथा तद्धितीय विभक्तियों का विशद निरूपण किया। लेखक सूक्ष्मता से दोनों व्याकरणों के सूत्रों की तुलना करती है, उदाहरण हेतु पाणिनि के सूत्र “करणे करणादिभ्यां करकं लभ्यते” तथा कच्चायन सूत्र “नञ् नञत्तु” की व्याख्या दी जाती है। यह भी दर्शाया गया है कि कच्चायन में कारक‑विभक्तियों का प्रयोग अपेक्षाकृत सरल है और वह लोकभाषाओं के निकट जाता है, जबकि पाणिनि में प्रत्येक विभक्ति के पीछे दार्शनिक एवं तात्त्विक तर्क छिपा है। लेख में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि यद्यपि दोनों व्याकरणों का लक्ष्य वाक्य‑रचना की शुद्धता है, कच्चायन का दृष्टिकोण व्यावहारिक एवं बौद्धिक श्रावकों के लिए आसान है, जबकि पाणिनि का व्याकरण अधिक शास्त्रीय और विश्लेषणात्मक है।

Conclusion

इस तुलनात्मक अध्ययन से स्पष्ट होता है कि पाणिनि और कच्चायन दोनों ही भारतीय भाषाशास्त्र के महत्त्वपूर्ण स्तम्भ हैं, परन्तु उनके कारक‑करण सिद्धांत अलग परम्पराओं को प्रतिबिम्बित करते हैं। श्वेता जैन का निष्कर्ष है कि कच्चायन व्याकरण ने व्याकरणीय नियमों को सरल बना कर बौद्ध समुदाय को लाभान्वित किया, जबकि पाणिनि का व्याकरण अपनी दार्शनिक गहराई के कारण व्यापक संस्कृत साहित्य का आधार बना रहा।

Article order

In this issue

Vol. 40
1-13Influence of Kashmir on the Ritual Literature of OrissaG. C. Tripathi14-23Conceptual basis of Yoga therapy in Yogopanisats and TaittiriyopanisatSushim Dubey24-40Plant-Human Linkage as Depicted in Sanskrit LiteratureDhananjay Vasudeo Dwivedi41-45GaddalikapravahahSatyavrat Verma46-56कुमारसम्भव में शिव-विषयक मिथक एवं अमूर्त शिवतत्त्वVasantkumar M. Bhatt57-65कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्रसूत्रि विरचित योगशास्त्र में ध्यानJitendra B. Shah66-94जैन संस्कृत व्याकरण परम्पराBalram Shukla95-107जैन परम्परा में धर्मध्यानDharmachand Jain108-113कच्चायनपाणिनिव्याकरणयोः कारककरणाय तुलनात्मक अध्ययनShweta JainCurrent article114-131संस्कृत स्वरों का मुक्तविकल्पन तथा प्राकृत भाषाएँSuhasani132-136प्राकृत कथा साहित्य की परम्परा एवं प्रकारHemvati Nandan Sharma137-147ब्रह्माकुमारी दर्शन में “ईश्वर” की अवधारणाSureshwar Meher148-151हमारी जीवन शैली कैसी हो?Lata Surendra Bothra152-157पहाड़ी शैली में राधा‑कृष्ण अंकनRitika Garg158-160ग्रंथ समालोचना : Scientific Perspectives of Jainism – जैन धर्म के वैज्ञानिक दृष्टिकोणUnexhibited

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