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प्राकृत कथा साहित्य की परम्परा एवं प्रकार

By Hemvati Nandan Sharma

Vol. 402017pp. 132-136Hindi

Summary

हेमवती नन्दन शर्मा का यह लेख प्राकृत भाषाओं के कथा साहित्य की परम्परा और विभिन्न प्रकारों का परिचय देता है। लेखक बताते हैं कि “कथा” शब्द संस्कृत धातु “कथ्” से व्युत्पन्न है जिसका अर्थ है—कहना। भारतीय साहित्य में प्राकृत कथाएँ मुख्यतः जैन और बौद्ध परम्पराओं से जुड़ी हैं और उनका उद्देश्य धार्मिक उपदेश, नैतिक शिक्षा तथा लोकमनोरंजन है। लेख में “जैन कथा” और “जैन प्रबंध” की परंपरा का वर्णन है जिसमें शौरसनी एवं अर्धमागधी प्राकृत में लिखे गये ग्रन्थ जैसे “वासुदेवहिंडी”, “कुवलयमाला” और “उपमितिभवप्रपंचकथा” का उल्लेख है। बौद्ध कथाओं में “जातक कथाएँ” और “अवदान शतक” प्रमुख हैं जिनमें पूर्व जन्मों की गाथाएँ एवं नीतिपरक प्रसंग मिलते हैं। लेखक इस बात पर बल देते हैं कि प्राकृत कथाएँ सरल भाषा, सहज संवाद, और स्पष्ट संरचना के कारण जन‑सामान्य में लोकप्रिय रहीं और उन्होंने संस्कृत गद्य‑काव्य की परम्परा को भी प्रभावित किया। लेख में कथाओं को प्रकारानुसार विभाजित किया गया है—धार्मिक‑आध्यात्मिक कथाएँ, राजकुमारों की वीर गाथाएँ, प्रेम‑कथाएँ और मनोरंजक लोककथाएँ। प्रत्येक प्रकार की शैली, उद्देश्य और कथानक पर संक्षिप्त चर्चा की गयी है।

Conclusion

लेख का निष्कर्ष यह है कि प्राकृत कथा‑साहित्य भारतीय साहित्यिक परम्परा की एक समृद्ध और बहुरंगी शाखा है। इसकी कथाएँ धर्मोपदेश, नीति‑शिक्षा और मनोरंजन तीनों प्रयोजनों की पूर्ति करती हैं। हेमवती नन्दन शर्मा के अनुसार, इन कथाओं की सहजता और लोकसंवादिता के कारण वे आज भी प्रासंगिक हैं और भारतीय कथाकथन की परम्परा को समझने में महत्वपूर्ण हैं।

Article order

In this issue

Vol. 40
1-13Influence of Kashmir on the Ritual Literature of OrissaG. C. Tripathi14-23Conceptual basis of Yoga therapy in Yogopanisats and TaittiriyopanisatSushim Dubey24-40Plant-Human Linkage as Depicted in Sanskrit LiteratureDhananjay Vasudeo Dwivedi41-45GaddalikapravahahSatyavrat Verma46-56कुमारसम्भव में शिव-विषयक मिथक एवं अमूर्त शिवतत्त्वVasantkumar M. Bhatt57-65कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्रसूत्रि विरचित योगशास्त्र में ध्यानJitendra B. Shah66-94जैन संस्कृत व्याकरण परम्पराBalram Shukla95-107जैन परम्परा में धर्मध्यानDharmachand Jain108-113कच्चायनपाणिनिव्याकरणयोः कारककरणाय तुलनात्मक अध्ययनShweta Jain114-131संस्कृत स्वरों का मुक्तविकल्पन तथा प्राकृत भाषाएँSuhasani132-136प्राकृत कथा साहित्य की परम्परा एवं प्रकारHemvati Nandan SharmaCurrent article137-147ब्रह्माकुमारी दर्शन में “ईश्वर” की अवधारणाSureshwar Meher148-151हमारी जीवन शैली कैसी हो?Lata Surendra Bothra152-157पहाड़ी शैली में राधा‑कृष्ण अंकनRitika Garg158-160ग्रंथ समालोचना : Scientific Perspectives of Jainism – जैन धर्म के वैज्ञानिक दृष्टिकोणUnexhibited

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