जैन परम्परा में धर्मध्यान
By Dharmachand Jain
Summary
धर्मचन्द्र जैन का यह लेख जैन धर्म में “धर्मध्यान” की अवधारणा का विशद परिचय देता है। जैन दर्शन ध्यान को चार भेदों में बाँटता है—आर्त ध्यान, रौद्र ध्यान, धर्म ध्यान और शुक्ल ध्यान। लेखक तत्त्वार्थसूत्र, उत्तराध्ययन, ज्ञानार्णव और प्राकृत गाथाओं के आधार पर समझाते हैं कि धर्मध्यान क्या है और इसे कैसे साधा जाता है। आर्त और रौद्र ध्यान के विपरीत, जो संसार की चिन्ता, हिंसा या क्रोध से उत्पन्न होते हैं, धर्मध्यान आत्मा को गुणस्थान के उच्चतर स्तरों की ओर ले जाने वाला निर्मल मनन है। इसमें सत्संग, विनय, उपदेश, गुरु‑भक्ति, संयमित आहार, करुणा और क्षमा जैसे गुणों का अभ्यास शामिल है। लेख में श्रावक और साधु दोनों के लिए धर्मध्यान की आवश्यकता बतायी गयी है। उदाहरणों में सुदर्शन श्रावक, राजा श्रेणिक, रथवेगी, रघु, कच्चु आदि की कथाएँ आती हैं, जिनके माध्यम से दिखाया जाता है कि कैसे धर्मध्यान ने उन्हें कषायों के क्षय, संयम की सिद्धि और मोक्ष प्राप्ति की ओर अग्रसर किया। लेखक यह भी बताते हैं कि परिस्थिति के अनुकूल स्वयं को ढालना, प्रकृति की अनुकूलता स्वीकार करना और प्रत्येक मनुष्य में ईश्वरत्व देखना धर्मध्यान के अभिन्न अंग हैं।
Conclusion
लेख में निष्कर्ष निकाला गया है कि धर्मध्यान जैन साधना का हृदय है। यह मन को राग‑द्वेष से मुक्त कर संयम, करुणा और वैराग्य की ओर ले जाता है तथा जीव को क्रमशः शुक्ल ध्यान और मोक्ष के लक्ष्य की ओर उन्नत करता है। धर्मचन्द्र जैन के अनुसार आधुनिक जीवन में भी धर्मध्यान का अभ्यास आत्मिक शुद्धि और सामाजिक सद्भाव के लिए आवश्यक है।