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जैन परम्परा में धर्मध्यान

By Dharmachand Jain

Vol. 402017pp. 95-107Hindi

Summary

धर्मचन्द्र जैन का यह लेख जैन धर्म में “धर्मध्यान” की अवधारणा का विशद परिचय देता है। जैन दर्शन ध्यान को चार भेदों में बाँटता है—आर्त ध्यान, रौद्र ध्यान, धर्म ध्यान और शुक्ल ध्यान। लेखक तत्त्वार्थसूत्र, उत्तराध्ययन, ज्ञानार्णव और प्राकृत गाथाओं के आधार पर समझाते हैं कि धर्मध्यान क्या है और इसे कैसे साधा जाता है। आर्त और रौद्र ध्यान के विपरीत, जो संसार की चिन्ता, हिंसा या क्रोध से उत्पन्न होते हैं, धर्मध्यान आत्मा को गुणस्थान के उच्चतर स्तरों की ओर ले जाने वाला निर्मल मनन है। इसमें सत्संग, विनय, उपदेश, गुरु‑भक्ति, संयमित आहार, करुणा और क्षमा जैसे गुणों का अभ्यास शामिल है। लेख में श्रावक और साधु दोनों के लिए धर्मध्यान की आवश्यकता बतायी गयी है। उदाहरणों में सुदर्शन श्रावक, राजा श्रेणिक, रथवेगी, रघु, कच्चु आदि की कथाएँ आती हैं, जिनके माध्यम से दिखाया जाता है कि कैसे धर्मध्यान ने उन्हें कषायों के क्षय, संयम की सिद्धि और मोक्ष प्राप्ति की ओर अग्रसर किया। लेखक यह भी बताते हैं कि परिस्थिति के अनुकूल स्वयं को ढालना, प्रकृति की अनुकूलता स्वीकार करना और प्रत्येक मनुष्य में ईश्वरत्व देखना धर्मध्यान के अभिन्न अंग हैं।

Conclusion

लेख में निष्कर्ष निकाला गया है कि धर्मध्यान जैन साधना का हृदय है। यह मन को राग‑द्वेष से मुक्त कर संयम, करुणा और वैराग्य की ओर ले जाता है तथा जीव को क्रमशः शुक्ल ध्यान और मोक्ष के लक्ष्य की ओर उन्नत करता है। धर्मचन्द्र जैन के अनुसार आधुनिक जीवन में भी धर्मध्यान का अभ्यास आत्मिक शुद्धि और सामाजिक सद्भाव के लिए आवश्यक है।

Article order

In this issue

Vol. 40
1-13Influence of Kashmir on the Ritual Literature of OrissaG. C. Tripathi14-23Conceptual basis of Yoga therapy in Yogopanisats and TaittiriyopanisatSushim Dubey24-40Plant-Human Linkage as Depicted in Sanskrit LiteratureDhananjay Vasudeo Dwivedi41-45GaddalikapravahahSatyavrat Verma46-56कुमारसम्भव में शिव-विषयक मिथक एवं अमूर्त शिवतत्त्वVasantkumar M. Bhatt57-65कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्रसूत्रि विरचित योगशास्त्र में ध्यानJitendra B. Shah66-94जैन संस्कृत व्याकरण परम्पराBalram Shukla95-107जैन परम्परा में धर्मध्यानDharmachand JainCurrent article108-113कच्चायनपाणिनिव्याकरणयोः कारककरणाय तुलनात्मक अध्ययनShweta Jain114-131संस्कृत स्वरों का मुक्तविकल्पन तथा प्राकृत भाषाएँSuhasani132-136प्राकृत कथा साहित्य की परम्परा एवं प्रकारHemvati Nandan Sharma137-147ब्रह्माकुमारी दर्शन में “ईश्वर” की अवधारणाSureshwar Meher148-151हमारी जीवन शैली कैसी हो?Lata Surendra Bothra152-157पहाड़ी शैली में राधा‑कृष्ण अंकनRitika Garg158-160ग्रंथ समालोचना : Scientific Perspectives of Jainism – जैन धर्म के वैज्ञानिक दृष्टिकोणUnexhibited

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