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संस्कृत स्वरों का मुक्तविकल्पन तथा प्राकृत भाषाएँ

By Suhasani

Vol. 402017pp. 114-131Hindi

Summary

लेखिका सुधांसिनी ने इस आलेख में संस्कृत ध्वनियों के मुक्तविकल्पन (फ्री वैरिएशन) की अवधारणा और प्राकृत भाषाओं से उसका सम्बन्ध स्पष्ट किया है। मुक्तविकल्पन वह स्थिति है जब दो या अधिक ध्वनियाँ किसी शब्द में अर्थ बदलने बिना एक‑दूसरे के स्थान पर प्रयोग हो सकती हैं। लेखक उदाहरण देते हैं जैसे संस्कृत में /र/ और /ल/ का अदल‑बदल, /श/ तथा /स/ का वैकल्पिक प्रयोग, एवं अनास्‍प्रिय वाचन में आकांशाओं का उच्चारण। लेख में बताया गया है कि ऐसे मुक्तविकल्पन संस्कृत के विभिन्न प्रादेशिक उच्चारणों, सामाजिक स्तरों और मंत्रोच्चार परम्पराओं में स्वाभाविक थे। आगे वह दर्शाती हैं कि प्राकृत भाषाओं—जैसे शौरसेनी, माहाराष्ट्री, अर्धमागधी—के विकास में इन्हीं विकल्पों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। संस्कृत के दन्त्य और तालव्य ध्वनियों के अभ्यंतर परिवर्तन से प्राकृत में ध्वनि‑सरलीकरण हुआ जिसके परिणामस्वरूप /क/→/ग/, /त/→/द/ आदि परिवर्तन देखे जाते हैं। यह भी बताया गया है कि मुक्तविकल्पन की प्रवृत्ति संस्कृत में अपेक्षाकृत कम रही पर प्राकृत भाषाओं में यह अधिक व्यापक है क्योंकि वे बोलचाल की भाषाओं से निकलीं। लेख ध्वन्यात्मक नियमों, पर्यायवाची ध्वनियों, पदलोप और संधि‑विकल्पन जैसे विषयों की चर्चा करके भाषाविज्ञानियों का ध्यान प्राकृत‑संस्कृत सम्बन्ध की नई व्याख्या की ओर आकृष्ट करता है।

Conclusion

लेख से यह निष्कर्ष निकलता है कि संस्कृत में सीमित रूप से मौजूद मुक्तविकल्पन प्राकृत भाषाओं के विकास में एक महत्वपूर्ण कारक रहा। ध्वनि‑परिवर्तनों और विकल्पों के अध्ययन से पता चलता है कि लोकप्रयोग, क्षेत्रीय बोलियों और उच्चारण की छूट ने प्राकृतों को संस्कृत से अलग स्वतंत्र भाषिक पहचान दी। सुधांसिनी के अनुसार, ध्वनि विज्ञान के इस दृष्टिकोण से संस्कृत और प्राकृत दोनों की संरचना को बेहतर समझा जा सकता है।

Article order

In this issue

Vol. 40
1-13Influence of Kashmir on the Ritual Literature of OrissaG. C. Tripathi14-23Conceptual basis of Yoga therapy in Yogopanisats and TaittiriyopanisatSushim Dubey24-40Plant-Human Linkage as Depicted in Sanskrit LiteratureDhananjay Vasudeo Dwivedi41-45GaddalikapravahahSatyavrat Verma46-56कुमारसम्भव में शिव-विषयक मिथक एवं अमूर्त शिवतत्त्वVasantkumar M. Bhatt57-65कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्रसूत्रि विरचित योगशास्त्र में ध्यानJitendra B. Shah66-94जैन संस्कृत व्याकरण परम्पराBalram Shukla95-107जैन परम्परा में धर्मध्यानDharmachand Jain108-113कच्चायनपाणिनिव्याकरणयोः कारककरणाय तुलनात्मक अध्ययनShweta Jain114-131संस्कृत स्वरों का मुक्तविकल्पन तथा प्राकृत भाषाएँSuhasaniCurrent article132-136प्राकृत कथा साहित्य की परम्परा एवं प्रकारHemvati Nandan Sharma137-147ब्रह्माकुमारी दर्शन में “ईश्वर” की अवधारणाSureshwar Meher148-151हमारी जीवन शैली कैसी हो?Lata Surendra Bothra152-157पहाड़ी शैली में राधा‑कृष्ण अंकनRitika Garg158-160ग्रंथ समालोचना : Scientific Perspectives of Jainism – जैन धर्म के वैज्ञानिक दृष्टिकोणUnexhibited

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