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जैन संस्कृत व्याकरण परम्परा

By Balram Shukla

Vol. 402017pp. 66-94Hindi

Summary

बलराम शुक्ल द्वारा लिखित यह विस्तृत लेख जैन विद्वानों द्वारा संस्कृत व्याकरण परम्परा में किए गये योगदानों का समग्र अध्ययन है। लेख प्रारम्भ में संकेत करता है कि यद्यपि संस्कृत व्याकरण का प्रमुख स्तम्भ पाणिनि का “अष्टाध्यायी” रहा है, जैन आचार्यों ने अपने आध्यात्मिक और व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए अलग‑अलग व्याकरणों का सृजन किया। इनमें पिंगलाचार्य, देवनन्दिन, शीशिरसेन, पुज्यपाद देवसेन, पुष्पदन्त, हेमचन्द्र, यक्षरश्मि, चारुक आदि अनेक नाम आते हैं। लेखक वर्णन करता है कि इन ग्रंथों का मुख्य ध्येय भाषा के माध्यम से धर्मोपदेश देना, श्रावकों को संस्कृत शिक्षित बनाना तथा पाणिनीय परम्परा में बदलाव करना था। लेख में प्राकृत और अपभ्रंश भाषाओं के विकास में जैन व्याकरणों की भूमिका, उनके सूत्रों की सरलीकृत शैली, तथा स्त्रियों व सामान्य जनता के लिए सरल संस्कृत प्रयोग का उल्लेख है। पाणिनि के विपरीत, जैन व्याकरणकार नियमों को अधिक व्यावहारिक बनाते हुए धर्मशास्त्रों के उद्धरण देते हैं। कई उदाहरणों द्वारा लेखक दिखाता है कि उन्होंने अनुवृत्ति, लाघव, षट्पदी सन्धि, संज्ञा‑प्रक्रिया, एकाक्षर सन्धि, वेदाङ्ग शिक्षाओं की पुनर्व्याख्या और पर्यायवाची शब्दों के विस्तार में नवोन्मेष किया। लेख अंग्रेजी स्रोतों से भी उद्धरण देकर बताता है कि आधुनिक विद्वान जैन व्याकरणों को पाणिनीय परम्परा का वैकल्पिक धारा मानते हैं और इनके ऐतिहासिक महत्त्व को स्वीकार करते हैं। यह परम्परा न केवल भाषा‑शिक्षा का साधन रही बल्कि जैन धर्म के प्रचार, लोकभाषाओं के विकास और संस्कृत साहित्य की बहुलता को समझने में भी सहायक रही।

Conclusion

लेख का निष्कर्ष यह है कि जैन व्याकरण परम्परा भारतीय भाषाशास्त्र में एक विशिष्ट धारा के रूप में उभरती है। पाणिनि की परम्परा से अलग चलते हुए इन व्याकरणों ने भाषा‑विज्ञान को सरल, व्यवहारिक और धार्मिक दृष्टि से उपयोगी बनाया। बलराम शुक्ल के अनुसार, इस परम्परा ने संस्कृत तथा लोकभाषाओं के बीच सेतु का कार्य किया और जैन धर्म की शिक्षाओं को व्यापक समाज तक पहुँचाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी।

Article order

In this issue

Vol. 40
1-13Influence of Kashmir on the Ritual Literature of OrissaG. C. Tripathi14-23Conceptual basis of Yoga therapy in Yogopanisats and TaittiriyopanisatSushim Dubey24-40Plant-Human Linkage as Depicted in Sanskrit LiteratureDhananjay Vasudeo Dwivedi41-45GaddalikapravahahSatyavrat Verma46-56कुमारसम्भव में शिव-विषयक मिथक एवं अमूर्त शिवतत्त्वVasantkumar M. Bhatt57-65कलिकाल सर्वज्ञ आचार्य हेमचन्द्रसूत्रि विरचित योगशास्त्र में ध्यानJitendra B. Shah66-94जैन संस्कृत व्याकरण परम्पराBalram ShuklaCurrent article95-107जैन परम्परा में धर्मध्यानDharmachand Jain108-113कच्चायनपाणिनिव्याकरणयोः कारककरणाय तुलनात्मक अध्ययनShweta Jain114-131संस्कृत स्वरों का मुक्तविकल्पन तथा प्राकृत भाषाएँSuhasani132-136प्राकृत कथा साहित्य की परम्परा एवं प्रकारHemvati Nandan Sharma137-147ब्रह्माकुमारी दर्शन में “ईश्वर” की अवधारणाSureshwar Meher148-151हमारी जीवन शैली कैसी हो?Lata Surendra Bothra152-157पहाड़ी शैली में राधा‑कृष्ण अंकनRitika Garg158-160ग्रंथ समालोचना : Scientific Perspectives of Jainism – जैन धर्म के वैज्ञानिक दृष्टिकोणUnexhibited

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