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'संस्कृत की वैज्ञानिकता' तथा व्याकरणशास्त्र को पतंजलि की देन

By Yogini Himanshu Vyas

Vol. XXXVII2014pp. 81-87Hindi

Summary

संस्कृत की वैज्ञानिकता' તથા व्याकरणशास्त्र को पतझ्नलि की देन योगिनी हिमांशु व्यास 'ऋग्वेद' की इस ऋचा' का व्याकरणपरक अर्थघटन करके મેધાવી वैयाकरण પતગ્ઞલિ ने संस्कृत व्याकरण के अध्ययन का महत्त्व स्पष्ट किया દે । महान्‌ वृषभ देव (नित्य शब्द तत्त्व - शब्द ब्रह्म) के नाम, आख्यात, उपसर्ग ઔર निपात - ये चार सींग हैं । भूत, भविष्यत्‌ और वर्तमानकाल - ये तीन पैर या चरण हैं । नित्य और कार्य (उत्पाद्य) दो शब्दात्मा (दो शब्द स्वरूप) - दो मस्तक हैं । प्रथमादि सात विभक्तियां - सात हाथ हैं । उच्चारण में सहयोगी स्थान-हदय, कण्ठ और मस्तक में आबद्ध वृषभ देव मर्त्यों में પ્રવિ है । ऐसे महान्‌ शब्दब्रह्म रूप देव के साथ हमारा सायुज्य होने की अभिलाषा से व्याकरण का अभ्यास करना चाहिए | व्याकरण की सहाय સે सुसंस्कृत વાળી का माहात्म्य दर्शाते हुए *ऋग्वेद' में कहा गया हैं कि દ્ર अपनी बुद्धि से वाणी જો शुद्ध करने के बाद वाणी का प्रयोग करते हैं ।* वैदिक कवि और विद्वान वाणी में एक निश्चित प्रकार की व्यवस्था और विभाग की आकांक्षा रखते हैं - यह बात “तैत्तिरीय संहिता'* के उल्लेख से विदित होती है । शब्दों के साधुत्व के बारे में પતગ્રલિ का कहना है कि “एक: शब्द: सम्यग्ज्ञात: शास्रान्वित: सुप्रयुक्त: स्वर्गे लोके कामधुगू भवति ।' शब्दों का यथार्थ रूप में प्रयोग करने के विषय में पतझ्ञलि कहते हैं कि व्याकरण-शाख्र જો जाननेवाला ગો વિદ્વાન उचित समय पर शब्दों का यथार्थ रूप में प्रयोग करता है; वह वाणी के वास्तविक प्रयोग को जाननेवाला विद्वान, परलोक में अत्यन्त उत्कर्ष को प्राप्त करता है और जो वाणी के समुचित प्रयोग को जाननेवाला अपशब्द-अशुद्ध शब्द का प्रयोग करता है; वह दूषित होकर नरक में जाता है ।* इसी प्रकार पातंजल योगसूत्र में लिखा દે : 'शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात्‌ संकरस्तत्प्रविभाग संयमात्‌ सर्वभूतरुत ज्ञानमू ।* आशय यह है कि भाषा के सम्बन्ध में सदा से विचार होता रहा है, किन्तु संस्कृत भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन आधुनिक युग की देन है | संस्कृत भाषा का “વિજ્ઞાન वह विशिष्ट ज्ञान हैं | जिनके आधार पर संस्कृत भाषा एवं उसके अंगों का विश्लेषण किया जाता है | भाषा का निर्माण मनुष्य के मुख से निकली स्वाभाविक ध्वनियों (वर्णों) से होता है । इस भाषा 82 योगिनी हिमांशु व्यास SAMBODHI का सामान्य ज्ञान, इसके बोलने તથા सुनने વાતે सभी मनुष्यों को हो जाता દે । उसीके द्वारा मानव परस्पर भावों एवं विचारों का आदान-प्रदान करते हैं । यही भाषा का सामान्य ज्ञान है | इसके साथ ही, संस्कृत भाषा कब बनी

Conclusion

संभवे प्रथमद्वि्वचनस्य द्वितीयद्विवचनं बाधिष्यते । (६--१-२ सूत्रभाष्य, ૦1.11) एवं તરિ स्फोट: शब्द: ध्वनि: शब्द गुण: । - तपरस्तत्कालस्य-पा.सू.का भाष्य “જો रो @ (अष्टाध्यायी ८.२.१८) ध्वनि: स्फोटश्र शब्दानां ध्वनिस्तु खलु लक्ष्यते | अलपो પણથ केषाज्ञिदुभयं तत्स्वभावत: ॥ महाभाष्य, तपरस्तत्कालस्य (अष्टा.१/१/७० જા भाष्य) भेयधितवत्‌ । તથા भेयघात: । भेरीमाहत्य જાશિત્‌ विशति पदानि गच्छति જશિત્‌ ek, कश्चितू चत्वारिंशतू । स्फोटश्र॒ तत्वानेन भवति, ध्वनिकृता वृद्धि: | शब्दविधेव नो भाति राजनीतिरपस्पशा | - शिशुपालवधम्‌ - २/१२ વ. शाख्रस्यारम्भको ग्रन्थ उपोद्घात इतीरित: | स एवं ग्रन्थसन्दर्भ: વર્શ: कथितो बुधै: 1 - महाभाष्यप्रदीपोद्ययोतन टीका वैयाकरणानां शाकटायनो रथमार्ग आसीन: शकटसार्थ વાત नोपलेभे | - महाभाष्य-आहिक-३६ સઠ મ મઠ

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Vol. XXXVII
1-12Life and Works of Prof. Nagin J. ShahNagin J Shah13-30The Works of Vacaka UmasvatiM. A. Dhaky31-53Ethical Aspect of BuddhismYajneshwar S. Shastri54-59Critique of 'Avidyavicara' of Prof. Nagin G. ShahVijay Pandya60-63The Moral Codes of the Swaminarayanism and of the Jainism: A Comparative StudyNarayan M. Kansara64-72Relevance of Sanskrit to Modern WorldSunanda Y Shastri73-80भारतीय नवजागृति के तीन दार्शनिकों की समीक्षा : स्वामी विवेकानंद, दयानंद सरस्वती और ज्योतिबा फूले के विशेष संदर्भ मेंDilip Charan81-87'संस्कृत की वैज्ञानिकता' तथा व्याकरणशास्त्र को पतंजलि की देनYogini Himanshu VyasCurrent article88-90कालिदास के शब्दालंकार और अर्थालंकार का मूल रहस्यVarshaben H. Patel91-92શ્રી નગીનદાસ જીવણલાલ શાહ : સંસ્મરણો (જન્મ : ઈ.સ. ૧૯૩૧ - દેહાવસાન : ૪-૧-૨૦૧૪) સાયલા (જિ. સુરેન્દ્રનગર)C. V. Raval93-95' भूयोविद्य: ' 'स्थिरपीत: ' વિદ્વાન શ્રી નગીનભાઈ શાહLakshmesh Joshi96-97પ્રો. નગીનભાઈ શાહ : સંસ્મરણોNilanjana S. Shah98-100ખરી ખોટ !Hasu Yajnik101-104સહાધ્યાયી સખાKantilal B. Shah105-106શીલભદ્ર વિદ્યાપુરુષVasant Parikh107-108પૂ.સ્વ. શ્રી નગીનદાસભાઈ શાહને સ્મરણસુમનાંજલિParul N. Mankad109-110નખશિખ વિદ્વાનપુરુષ શ્રી નગીનભાઈMalti Shah111-113દીપક બુઝાયોJitendra B. Shah114-129નગીન શાહ પ્રમાણે શાંકરવેદાન્તમાં અવિદ્યાવિચારMadhusudan Baxi130-140ન્યાયદર્શનમાં કથાનિરૂપણNiranjan Patel141-145ततोऽणिमादिप्रादुर्भाव:...। (યોગસૂત્ર ૩.૪૫) ઉપર થોડોક વિચારKamleshkumar Ch. Choksi146-166વર્ધમાન : પાણિનીય ધાતુપાઠના એક અપ્રસિદ્ધ વૃત્તિકારNilanjana S. Shah167-177જૈન અને બૌદ્ધ ધર્મશાસનમાં પર્યાવરણ સંરક્ષણNiranjana Vora178-182સંસ્કૃત સાહિત્યનો ગુજરાતી સાહિત્ય પર પ્રભાવChandrakant Sheth183-191સત્રિય લોકનાટ્યBhimji Khachariya192-200શૃંગારરસ અને સતીપ્રથા : એક નોંધRajendra Nanavati201-205વિભાવના અને વિશેષોક્તિ અલંકારમાં કાર્યાંશનું બાધ્યત્વParul N. Mankad206-213મહાકવિશ્રી નારાયણભટ્ટપાદકૃત 'कोटिविरहम्” એક અભ્યાસSurekha K. Patel214-216ĪśāvāsyopaniṣadYajneshwar S. Shastri217-219काश्मीर शिवागमों में प्रमाण चिन्तन : पुस्तक की समीक्षा – समालोचनाSuryaprakash Vyas

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