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कालिदास के शब्दालंकार और अर्थालंकार का मूल रहस्य

By Varshaben H. Patel

Vol. XXXVII2014pp. 88-90Hindi

Summary

कालिदास के शब्दालंकार और अर्थालंकार का मूल रहस्य वर्षाबेन पटेल कालिदास की उपमाओं का प्रत्यक्ष रुप से विवेचन आरम्भ करने से पहले अलंकारों के सम्बन्ध . में और एक दो बातों का विचार कर हमारी कुछ धारणाओं જોં और भी स्पष्ट कर लेना आवश्यक है। हम जानते है कि अलंकार જો साधारणतः दो શ્રેખિયો में વિષ किया जा. सकता है - शब्दालंकार एवं अर्थालंकार । इन दो प्रकार के अलंकारो को हम शब्द के दो साधारण धर्मों से संयुक्त कर सकते है एक है शब्द का संगीत-धर्म और दूसरा है शब्द का चित्र-धर्म | यह पुनः उल्लेखनीय है कि हम यहां शब्द . का प्रयोग उसके प्रचलित संकीर्ण अर्थ में नहीं, बल्कि उसके व्यापक अर्थ में कर रहे है, जिस अर्थ में उसंकी प्रकाश रुपता है । अनिवर्चनीय रसानुभूति को आभासित करने के प्रयास में सबसे बडा सहायक है संगीत । हमने पहले ही देखा है कि काव्य का जो वाच्य है, वह सर्वत्र ही विशेष है । वाच्य के इसी विशेषत्व को प्रकट करने के लिए भाषा को भी विशेषत्व प्रांत करना होता है । भाषा को अपने व्यावहारिक सांधारणत्व का अतिक्रमण कर असाधारण हो उठने में यह संगीत धर्म बहुत-कुछ सहायता पहुंचाता है। काव्य के संगीत-धर्म का प्रकाश एक તો ઇનર में होता है और दूसरे शब्दालंकारो મેં | शब्दालंकार जहां कवि के वा्गे-स्वयं प्रकाश की एक साडम्बर चेष्टा मात्र रहता है, वहाँ काव्य शरीर में वह व्याधि तुल्य है, भूषण नहीं, दूषण है । किन्तु शब्दालंकार का यथार्थ कार्य है शब्द के अर्थ को विचित्र ध्वनि-तरंग द्वारा विस्तृत करना | हृदय की ગો अस्फुट बात भाषा में अभिव्यक्त नहीं हो पाती, उसको आभासितकर देना | उपयुक्त છત્ર के संग इसीलिए जब उपयुक्त शब्दालंकार का योग होता है, तब इस पारस्परिक साहचर्य शब्द-शक्ति का अनन्त एवं अपूर्व विस्तार होता है | कालिदास के रघुवंश काव्य में देखते है कि रामचन्द्र के सीता को लेकर विमान द्वारा लंका से अयोध्या लौटने के समय कवि समुद्र का वर्णन करते हुए कहता है। दूरादयश्रक्रनिभस्य તથી तमाल - ताली वनराजि नीला | आभाति वेला लवणाम्बुराशे धाराबिद्धेव कलंकरेखा ॥ यही शब्दालंकार की जो भंकार उठी है, उससे समुद्र का वर्णन सार्थक हो उठा है । ग्रा कार के बाद W कार के द्वारा समुद्र की सीमाहीन विपुलता को जैसे ध्वनि द्वारा ही મૂર્ત कर दिया गया है । कुमारसंभव में उमा का वर्णन करते समय कविने कहा है कि - सच्चारिणी पल्नविनी लतेव । उद्धिन्रयौवना Vol. XXXVII, 2014 कालिदास के शब्दालंकार और अर्थालंकार

Conclusion

अस्पष्ट प्रतिच्छवियों का સંધાન मिल सकता है। कुछ मिलाकर हम देख पाते है कि हमारी ज्ञान - क्रिया सम्पूर्णत: नहीं તો, अधिकांशत: निष्पन्न होती है, बहिवस्तु या घटना की प्रतिच्छवि में | यह खूब स्पष्ट हो उठता है जब हम अपने मानसिक या आध्यात्मिक जगत्‌ के संबन्ध में कोई बात कहने जाते हैं, इन सभी विषयों की बात करते समय हमे बहिजगत्‌ की वस्तु या घटना की प्रतिच्छवि का सहारा लेना ही पडता है । भाषा में निहित यह जो बहिजगत्‌ू की प्रतिच्छवि है, वही भाषा का चित्र-धर्म है । भाषा का यह चित्र-धर्म ही विकसित होकर सृष्टि करता है।

Article order

In this issue

Vol. XXXVII
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